नीतिशास्त्र तथा मानवीय सहसम्बन्ध

नीतिशास्त्र तथा मानवीय सहसम्बन्ध

नीतिशास्त्र मानक नियमों एवं आदर्शों द्वारा मानवीय आचरण तथा व्यवहार का नियमन, मार्गदर्शन तथा मूल्यांकन करने वाली सामाजिक व्यवस्था है जिसका लक्ष्य व्यक्ति तथा समाज का अधिकतम कल्याण है।

नीतिशास्त्र :- 

  1. नीतिशास्त्र शुभ आचरण का अध्ययन करना है। अतः इसे चरित्र विज्ञान की भी संज्ञा दी जाती है।
  2. नीतिशास्त्र मानवीय नैतिकता के प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास करता है। जैसे :- न्याय, गुण, दोष।
  3. नीतिशास्त्र मानवीय व्यवहार के उस भाग की अच्छाई या बुराई का चिंतनशील अध्ययन है जिसकी कुछ व्यक्तिगत जवाबदेही है।
  4. नीतिशास्त्र उन मूल्यों एवं दिशा-निर्देशों का अध्ययन है जिसके द्वारा हम जीते है। इसमें इनकी औचित्यता भी शामिल है।

नैतिकता की विशेषता :-

  1. नैतिकता का सम्बन्ध व्यक्तियों के विवेक से है।
  2. नैतिकता अंतरात्मा की आवाज है।
  3. नैतिकता तर्क और विवेक पर आधारित है
  4. नैतिकता समय और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित होती है।
  5. नैतिकता एक आंतरिक पक्ष है जिसका पालन व्यक्ति स्वेच्छा से करता है।

मानवीय सहसम्बन्ध :-  मनुष्य सामाजिक प्राणी होने के नाते समाज का हिस्सा हैनीतिशास्त्र तथा मानवीय सहसम्बन्ध - ShivaGStudyPointनीतिशास्त्र का क्षारतत्व :-

  1. नीतिशास्त्र समाज में रहने वाले मानव के आचरण का मूल्यांकन करता है।
  2. नैतिकता मानव के ऐच्छिक कर्मों का मूल्याकंन करती है।
  3. रचनात्मकता एवं सृजनशीलता से नीतिशास्त्र का सम्बन्ध नहीं है।
  4. नीतिशास्त्र का सार समाज में शांति, समरूपता और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए है।
  5. यह हमारे चयन में निरंतर आने वाली समस्याओं का समाधान करता है जैसे – कहां रहना है, क्या करना है।

नीतिशास्त्र के निर्धारक तत्व :-

आन्तरिक तत्व – (व्यक्तिगत विश्वास व मूल्य)

समाज – इसमें व्यक्ति संस्कृति को सीखता है।

मनोवैज्ञानिक – यह व्यक्तित्व का गुण है जिन लोगों में कर्त्वव्यपरायणता अधिक होती है उनके नैतिक होने की संभावना भी अधिक होती है।

धार्मिक – नैतिकता के निर्धारण में धर्म का भी महत्वपूर्ण।

ऐच्छिक कर्म – नैतिकता के निर्धारण में तात्विक कारक भी होते है जैसे – संकल्प की स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व की नैतिकता।

बाह्य तत्व – (कानून व संगनात्मक पक्ष)

विधायी ढांचा – कानून बाहरी निर्धारकों में से सबसे महत्वपूर्ण।

संस्थागत ढांचा – न्यायपालिका – न्यायालयों के प्रयासों से नैतिक लोक नीतियों का निर्माण होता है।

लोक प्रचार – किसी मुद्दे के प्रचार-प्रसार से भी नैतिक मानदंड बनते है।

संविधान – विभिन्न देशों में संविधान भी नैतिक प्रवृत्ति को स्थापित करने का एक तरीका है।

नीतिशास्त्र का परिणाम :- इसका अर्थ नैतिक सिद्धांतों द्वारा निर्देशित मानवीय गतिविधियों/कार्यवाहियों/क्रियाकलापों के परिणाम से है।

अर्थात् कोई गतिविधि कितनी अच्छी या बुरी थी, इसका निर्धारण उसके परिणाम होते है। परिणाम मापक – सुख, दुःख, पीड़ा, खुशी।

नैतिकता के आयाम :-

भारतीय परिपेक्ष्य :- आश्रय व्यवस्था – इसमें अलग-अलग आयु में नैतिक आचरण को प्रस्तावित किया गया है।

वर्ण व्यवस्था – इसके अंतर्गत सत्वगुणों के पालन के लिये कुछ आदर्शात्मक सिद्धांतों का वर्णन किया गया है।

सामान्य धर्म – प्रत्येक धर्म में सत्य, अहिंसा, प्रेम, करूणा भाईचारे की वकालत की गई।

पाश्चात्य दृष्टिकोण –

  • निर्देशनात्मक नीतिशा़स्त्र
  • मेटा एथिक्स
  • विवरणात्मक नीतिशास्त्र
  • प्रयोगात्मक नीतिशास्त्र
  • सदगुण नीतिशास्त्र
  • परिणामवादी नीतिशास्त्र
  • कर्त्तव्यपरायणता नीतिशास़्त्र
  • अधिनीतिशास्त्र

लोक जीवन में नैतिकता :- लोक जीवन में नैतिकता का अर्थ है कि सार्वजनिक क्रियाकलापों में सत्यनिष्ठा कर्त्तव्यनिष्ठता, ईमानदारी इत्यादि मूल्यों का प्रदर्शित होना।

निजी जीवन में नैतिकता – व्यक्ति अपने जीवन में ईमानदार है तथा सामाजिक विकास के संदर्भ में समर्पणभाव, धर्म, सत्य अहिंसा तथा धर्मनिरपेक्षता मूल्यों को आत्मसात करना। यद्यपि निजी जीवन में नैतिकता प्रत्येक व्यक्ति के लिए भिन्न होती है। किन्तु कुछ सामान्य सिद्धांत है जिन्हें समाज द्वारा स्वीकार किया गया है। 1. वफादारी/ निष्ठा 2. प्रेम 3. स्नेह

मूल्य (Values)

“मूल्य किसी वस्तु या विचार का वह गुण है जिससे व्यक्ति एवं समाज की आवश्यकता ये पूरी होती है। मूल्य अच्छे या बुरे के लिए वरीयता दर्शाते है।”

  • मूल्य –  सामान्यतः चाहिए के रूप में इन्हें व्यक्त किया जाता है।
  • स्थान और समय के अनुसार बदलते है।
  • यह अमूर्त है अर्थात् स्पष्ट नहीं है।
  • मूल्य सामूहिक होते है क्योंकि मूल्य बाह्य वातावरण, परिवार, अनुभव आदि के माध्यम से एकत्रित होते है।
  • मूल्य वस्तुतः व्यक्तिगत विश्वास होते है। जो लोगों को एक या दूसरे तरीके से कार्य करने के लिए प्रेरित करते है।

मानवीय मूल्य :- मानवीय मूल्य समाज द्वारा मान्यता प्राप्त इच्छायें एवं लक्ष्य है जिन्हें मानव सामाजिकरण की प्रक्रिया के माध्यम से सीखता है और जो व्यक्तिनिष्ठ अभिलाषायें बन जाती है। जैसे – सदगुण, प्रेम, सत्य स्वतंत्रता।नीतिशास्त्र तथा मानवीय सहसम्बन्ध - ShivaGStudyPoint

  • मानव मूल्य :- यह परिवार या समाज से मिलता है।
  • यह ये बताता है कि समाज में अन्य के साथ कैसा व्यवहार  किया जाये।
  • यह समय के अनुसार बदलते रहते है।
  • नैतिक मूल्य :- इनको सिखाया जाता है।
  • यह आत्मविकास एवं आत्म अनुशासन के लिए होता है।
  • यह स्थिर व अपरिवर्तित होते है।

मूल्य विकसित करने में परिवार, समाज और शैक्षणिक संस्थाओं की भूमिका :-

  • परिवार – परिवार मूल्यों की शिक्षा देने वाला पहला विद्यालय भी है।
  • परिवार के सदस्यों द्वारा दी जाने वाली नैतिक शिक्षाओं आदि के माध्यम से मूल्य विकसित होते है।
  • एक बच्चे का परिवार उसे दूसरो से प्यार एवं सम्मान करने के तरीके सीखाता है।
  • परिवार समाज में अन्य लोगों के प्रति बच्चों के दृष्टिकोण को आकार देता है।
  • परिवार के सदस्य बच्चों के लिए अनुकरणीय व्यक्ति होते है तथा बच्चा उन्हीं के जैसे व्यवहार करना सीखाता है।

समाज – समाज जिन मूल्यों को स्वीकार करता है इसके पीछे समाज की शक्ति काम करने लग जाती है इसलिए एक समाज को सामाजिक न्याय, सतत् विकास, समावेशी विकास तथा धर्मनिरपेक्षता जैस मूल्यों को स्वीकार करना चाहिए ताकि आने वाली भावी पीढ़ी इनका अनुकरण कर सके।

  • शैक्षणिक संस्था :- सहयोग की भावना का विकास क्योंकि बच्चा विद्यालय में 6-7 घंटा रहता है जिससे उसका परस्पर सहयोग का सम्बन्ध बनता है।
  • यहाँ बच्चा पहली बार यह सीखता है कि जिन्हें आप पहले से नहीं जानते उनके साथ किस प्रकार मित्रता की जाती है।
  • वैचारिक विविधता के मूल्य का विकास।
  • शिक्षक महान अनुकरणीय व्यक्ति होते है।
  • बच्चों की शिक्षा को तथ्यात्मक पहलूओं की जगह वास्तविक पहलुओं पर केन्द्रित करना।
  • सम्बन्ध कौशल का विकास करने में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

अभिवृत्ति : विषयवस्तू संरचना एवं कार्य

अभिवृत्ति :- अभिवृत्ति किसी व्यक्ति की मानसिक तस्वीर या प्रतिछाया है जिसके आधार पर वह व्यक्ति, समूह, वस्तु, परिस्थिति या फिर किसी घटना के प्रति अनुकूल या प्रतिकूल विचार को प्रकृट करता है।नीतिशास्त्र तथा मानवीय सहसम्बन्ध - ShivaGStudyPointनीतिशास्त्र तथा मानवीय सहसम्बन्ध - ShivaGStudyPoint

विशेषता :-

  • अभिवृत्ति – अभिवृत्ति
  • अभिवृत्ति का कोई न कोई विषय होता है।
  • अभिवृत्ति एक विशेष दिशा में मार्गदर्शन करती है।
  • अभिवृत्ति में कर्षण शक्ति होती है।
  • निर्माण करने वाले कारक :- व्यक्तिगत सम्पर्क – किसी व्यक्ति या विषयवस्तु के प्रत्यक्ष सम्पर्क में आने पर उस विषय वस्तु के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति् का निर्माण होता है।
  • संदर्भ समूह – अभिवृत्ति के निर्माण में समूह एवं सांस्कृतिक मानकों की भूमिका।
  • संचार साधनों की भूमिका।
  • परिवार व विद्यालय का परिवेश – मां-बाप एवं शिक्षकों का अभिवृत्ति निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान।

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  • अभिवृत्ति एवं व्यवहार :- अभिवृत्ति प्रबल – व्यवहार का निर्देशन।
  • व्यवहार का मूल्यांकन नहीं – अभिवृत्ति एवं व्यवहार समान
  • अभिवृत्ति के प्रति जागरूक नहीं – अभिवृत्ति एवं व्यवहार में संगति।

नैतिक अभिवृत्ति :- नैतिक अभिवृत्ति का सामान्य सा अर्थ है कि सही और गलत का निर्धारण करना। गलत की निंदा की जाये और सही की प्रशंसा।

राजनैतिक अभिवृत्ति :- राजनैतिक विचारधारा, संसदीय व्यवस्था, राजनैतिक रूढ़िवाद, उदारवाद, राष्ट्रवाद इत्यादि जैसी व्यवस्थाओं के प्रति लोगों की पंसद या ना पसंद का निर्धारण।

सामाजिक प्रभाव :- जब एक व्यक्ति की क्रियायें दूसरे व्यक्ति की क्रियाओं के लिये आवश्यक दशा के रूप में कार्य करती है। सामाजिक प्रभाव अभिवृत्तिक परिवर्तन लाने के लिये एक संक्षेप साधन है।

  • सामाजिक प्रभाव का आधार – समरूपता
  • अनुपालन
  • आज्ञापालन
  • सामाजिक सुसाध्यकरण
  • सामाजिक लोकिंग

धारण/अनुन्य :- ऐसे प्रयास जो दूसरों की अभिवृत्तियों में अनेक प्रकार के संदेश का प्रयोग करते हुए अभिवृत्तिक परिवर्तन लाता है अर्थात् दूसरों की पसंद को प्रभावित करने वाला संचार ही धारण है।

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