राजनीति का अपराधीकरण: सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

राजनीति का अपराधीकरण: सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

  • सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक पीठ ने इस पर फैसला सुनाया है।
  • पब्लिक इन्ट्ररेस्ट फाउंडेशन  V/S  भारत संघ वाद में निर्णय दिया।
  • सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कुछ दिशा-निर्देश जारी किए है जो
  • प्रत्येक उम्मीदवार चुनाव आयोग के फॅार्म को पूरी तरह भरेगा।
  • मोटे अक्षरों में लंबित आपराधिक मामले के बारे में बताएगा।
  • राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार पार्टी को अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि के बारे में बताएगा।
  • संबंधित राजनीतिक दल उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि का ब्यौरा वेबसाइट पर डालेगा।
  • राजनीतिक दल और उम्मीदवार अखबार और इलेक्ट्रानिक मीडिया में उम्मीदवार की पृष्ठभूमि का व्यापक प्रचार करेगें। नामांकन दाखिल करने के बाद कम से कम तीन बार ऐसा प्रचार करेगें।

केन्द्र सरकार का पक्ष –

  • अटॉर्नी जनरल ने कहा कि पार्टी किसी को टिकट दे रही है तो हम यह नहीं कह सकते है कि उस पर केस है क्योंकि चुनाव से ठीक पहले झूठे केस भी लगा दिए जाते है।
  • जनप्रतिनिधित्व एक्ट, 1951 की धारा (8) में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी केस में अपराधी घोषित हो गया तो वह चुनाव में भाग नहीं ले सकता।
  • यदि वह ट्रायल में है तो वह चुनाव लड़ सकता है।
  • 3,800 आपराधिक केस 1,765 सांसद एवं विधायक पर वर्तमान में है। इसमें से 3,045 लम्बित है।
  • पृष्ठभूमि के बारे में घोषणा से चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष बनती है और मतदाता का चुनाव का अधिकार मजबूत होता है।

विपक्ष में तर्क –

  • भारत में बहुत ही कम लोग है जो राजनीतिक दलों की वेबसाइट पर विचरण करते है। इसलिए इसका कुछ फायदा नहीं होने वाला है।
  • राजनीतिक दलों को बाध्य नहीं किया गया कि केवल स्वच्छ छवि वाले व्यक्तियों को टिकट दे।
  • सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश तो दिए है किन्तु कानून के रूप में आदेश नहीं दिया। साथ ही विधायिका के ऊपर छोड़ दिया गया।

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