सेक्शन – 497 अडल्ट्री अब अपराध नहीं

सेक्शन – 497 अडल्ट्री अब अपराध नहीं

  • पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने 5:0 के स्कोर से सेक्शन – 497 ( IPC की धारा ) और सेक्शन – 198(2)  ( CRPC की धारा ) दोनों को असंवैधानिक कर दिया है।
  • IPC की धारा – 497 ( व्यभिचार )

कोई व्यक्ति जानबुझकर दूसरे की पत्नी से उसके पति की सहमति के बगैर शारीरिक सम्बन्ध बनाता है तो वह व्यभिचार का अपराधी है। उसे पांच वर्ष तक की कैद या जुर्माने या दोनों की सजा हो सकती है।

  • CRPC की धारा – 198(2)

व्यभिचार के जुर्म में सिर्फ पति ही शिकायत कर सकता है। महिला की देखभाल करने वाला व्यक्ति कोर्ट की इजाजत से पति की ओर से शिकायत कर सकता है।

  1. पति अपनी पत्नी का मालिक नहीं है।
  2. पत्नी को भी बराबरी का अधिकार है और उसे यौन स्वायतता भी हासिल है।
  3. यह धारा अनुच्छेद – 21 में मिले स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार का उल्लंघन करती है।
  4. महिलाओं की गरिमा बाधित होती है।
  5. यह कानून लैगिंक समानता के विरूद्व है।
  6. इसमें कोई संदेह नहीं कि व्याभिचार किसी भी तरह के दीवानी मुकदमें यहां तक कि तलाक का आधार हो सकता है।
  7. कोर्ट ने कहा कि इस फैसले से यह न समझा जाए कि इससे शादी तोड़ने का लाइसेंस मिल गया है।
  8. कोर्ट ने कहा, व्याभिचार भले अपराध नहीं हो सकता लेकिन यदि अपने जीवन साथी के व्याभिचार से आहत होकर कोई खुदकुशी करे और उसके सुबुत पेश किए जाएं तो उसे आत्महत्या के लिए उकसावा माना जा सकता है।
  • सुप्रीम कोर्ट का निर्णय नैतिक व्यवस्था के लिए घातक है कुछ आलोचकों का मानना है क्योंकि
  1. पारिवारिक एवं सामाजिक मूल्यों का विखण्डन होगा क्योंकि परिवार रूपी संस्था विश्वास पर टिकी है।
  2. यौन स्वतंत्रता से विश्वास पर चोट पहुंचती है जिससे विवाह पर प्रश्नचिह्न लगेगा।
  3. लीव इन रिलेसनशिप को प्रोत्साहन मिलेगा।

                      वस्तुत:  सुप्रीम कोर्ट का निर्णय एक प्रगतिशील कदम है जिसका उद्वेश्य महिलाओं की गरिमा को सुरक्षित करना है परन्तु यौन स्वतंत्रता के नाम पर यौन स्वच्छंदता समाज और राष्ट्र तीनों के लिए घातक है।

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