ब्रिटिश शासन Part – 5

आंग्ल-मराठा संघर्ष :-

कारण –

  • मराठों के बीच होने वाले आंतरिक झगड़े जैसे – राघोवा तथा नाना फड़नवीस।
  • अंग्रेजों की शक्तिशाली महत्वाकांक्षा

1775 ई. में राघोवा तथा बोम्बे प्रेसिडेंसी के मध्य एक समझौता हुआ जिसे सुरत की संधि कहा जाता है। कहीं न कहीं इस संधि में प्रथम आंग्ल-मराठा संघर्ष के बीच छिपे थे क्योंकि संधि में निम्न बातें तय की गई –

  • राघोवा को पेशवा बनाया जायेगा।
  • कंपनी को इसके बदले में सालसेट व बसीन का क्षेत्र दिया जायेगा।

1775 ई. में अंग्रेजों और मराठों के बीच “अरास” नामक जगह पर पहला युद्ध हुआ जिसमें मराठे हार गये। इसका नतीजा पुरन्दर की संधि (1776 ई.) के रूप में देखने को मिलता है।

पुरन्दर की संधि के प्रावधान –

  • कंपनी राघोवा का साथ नहीं देगी।
  • राघोवा अब पेंशनभोगी बन जायेगा।
  • सालसेट का क्षेत्र ब्रिटेन के पास रहेगा। लेकिन ऐसे समय में लंदन स्थित निदेशक मंडल ने मराठों से की गई पुरन्दर संधि को मान्यता नहीं दी और सुरत की संधि को मान्यता दी। लगातार युद्ध होते रहे। इस युद्ध में अंग्रेजों की हार होती है और वह बड़गाँव की संधि मराठों के साथ करता है।

यह संधि लगभग मराठों के पक्ष में थी लेकिन अंग्रेज चुप बैठने वाले कहाँ थे उन्होंने युद्ध को जारी रखा। कई सारे षड़यंत्र किए गए (जैसे – गायकवाद को अंग्रेजों के पक्ष में करना) अन्ततः 1782 ई. में महाजी सिंधिया की मध्यस्थता से कंपनी और मराठों के बीच युद्ध खत्म करने के लिए सालबाई की संधि होती है जिसके निम्नलिखित प्रावधान थे –

  • दोनों ने एक-दूसरे के जीते हुए प्रदेशों को छोड़ दिया।
  • कंपनी ने राघोवा का साथ छोड़ा और उसे पेंशनभोगी बना दिया।
  • सालसेट तथा ऐलीफेंटा कंपनी को दिया गया।
  • मैसूर के मामले में कंपनी को पूर्ण स्वतंत्रता मिली।

सालबाई की संधि का विश्लेषण –

  • इस संधि के द्वारा उसने मराठों को किसी भी प्रकार की बढ़त (वरीयता) नहीं लेने दिया। अर्थात् एक तरह से उसने मराठों को मनोवैज्ञानिक रूप से हराया।
  • सालबाई की संधि के द्वारा उसने एक तीर से दो निशाने किए –

A. राघोवा नामक शक्ति के केन्द्र को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।

B. मराठा संघ में सबसे शक्तिशाली महाजी सिंधिया को उसने संतुष्ठ कर दिया और उसकी संवेदनाएँ अपने पक्ष में ली अर्थात् सिंधियों को अपना वास्तविक मित्र हमेशा के लिए बना लिया।

  • सालसेट तथा ऐलींफेटा को प्राप्त कर उसने जहाँ एक तरफ राजस्व का महत्वपूर्ण स्त्रोत प्राप्त किया वहीं दूसरी ओर अपनी स्थायी नौसेना का ठिकाना प्राप्त किया। साथ ही साथ सालसेट मराठा गुरिल्ला युद्ध का महान केन्द्र था, उसने इस केन्द्र को सदा के लिए खत्म कर दिया।
  • उसने मराठा और मैसूर को हमेशा के लिए अलग कर दिया और दक्षिण भारत में कंपनी ने अपनी स्थिति हमेशा के लिए मजबूत कर ली।
  • Que 33. सालबाई की संधि के द्वारा युद्ध का अंत हुआ परिणाम का नहीं। स्पष्ट कीजिए।
  • Que 34. सालबाई की संधि के प्रावधानों में कई ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी व्यख्या है। इस मत से आप कहाँ तक सहमत है।

द्वितीय आंग्ल-मराठा संघर्ष 1803-06 –

कारण –

  • अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा
  • मराठों का आंतरिक संघर्ष – इस समय सिंधिया और होल्कर के बीच। इसमें सिंधिया का प्रभाव पेशवा पर ज्यादा था। सिंधिया के कहने पर पेशवा ने जसवंत राव होल्कर के भाई की हत्या कर दी। जिसका परिणाम यह हुआ कि होल्कर ने पुना पर आक्रमण किया और उस पर नियंत्रण स्थापित कर लिया, परिणामतः पेशवा बाजीराव द्वितीय भागता हुआ अंग्रेजों के पास पहुँचा और उसने 1802 में बेसीन की संधि कर ली।

बेसीन संधि के प्रावधान :-

  • पूना में ब्रिटिश सेना रहेगी।
  • 26 लाख रूपये आय वाले क्षेत्र कंपनी को दिया जायेगा।
  • सूरत कंपनी को दिया जायेगा।
  • हैदराबाद के निजाम से चौथ की वसूली मराठे नहीं करेगें।

हालाँकि इस संधि से कोई भी मराठा परिसंघ का नेता खुश नहीं है। अन्ततः अंग्रेजों एवं मराठों के बीच युद्ध आरंभ हो जाता है और विभिन्न जगहों पर मराठा परिसंघ के नेता पराजित होते है और अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग संधियाँ करने को मजबूर होते है। जैसे – देवगाँव की संधि, सुरजी भर्जन गाँव की संधि और राजपुरघाट की संधि।

Que 35. बेसीन/बसीन की संधि शुन्य के साथ की गई संधि थी। स्पष्ट कीजिए।

विश्लेषण :-

  1. पेशवा की विदेश नीति को अपने हाथों में कर लिया तथा पेशवा के खर्च पर ही एक स्थायी सेना बना ली।
  2. सुरत को प्राप्त कर उसने एक तरफ कच्चे माल प्राप्त करने का स्थायी ठिकाना बनाया और वहीं दूसरी ओर विनिर्मित सामान के लिए एक बड़ा बाजार प्राप्त किया।
  3. निजाम को मराठों से दूर कर दिया और उसके साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित किया। इस प्रकार मराठा, निजाम और मैसूर तीनों के बीच होने वाले गठबंधन को हमेशा के लिए समापत कर दिया। अर्थात् फूट डालो, राज करो की नीति के लिए एक बेहतर मंच का निर्माण किया।

तृतीय आंग्ल-मराठा संघर्ष –

यह संघर्ष उपरोक्त कारण की वजह से ही शुरू हुआ जिसकी शुरूआत नवम्बर 1817 में शुरू होता है। इस युद्ध के दौरान कंपनी ने सबसे पहले पेशवा को हराया और पूना की संधि की तत्पश्चात् भौंसले को पराजित किया और उसके साथ नागपुर की संधि की। अतः उसने सिन्धिया और होल्कर को पराजित किया जिसके साथ उसने ग्वालियर एवं मन्दसौर की संधि की। हाँलाकि सिंधियों के साथ होने वाला युद्ध दिखावा मात्र था वह युद्ध नहीं था।

निष्कर्ष – उपरोक्त तीन संघर्षों में अंग्रेजों ने मराठों को पराजित किया और उसने अधीनस्थ बना लिया हालाँकि नाममात्र का अस्तित्व रहने दिया गया।

  • Que 36. बेसिन की भूमिका व शुन्य।
  • Que 37. शुन्य की उत्पत्ति का कारण।
  • Que 38. शुन्य की उत्पत्ति होने से अंग्रेजों को क्या लाभ मिला।
  • Que 39. यदि शुन्य उत्पन्न नहीं होता तो क्या होता।

आंग्ल-मैसूर संघर्ष :-

कारण – अंग्रेज तथा हैदर अली की परस्पर महत्वाकांक्षा। हैदर अली एक शक्तिशाली शासक था वह किसी भी कीमत पर किसी भी बाहरी शक्ति को मैसूर राज्य में प्रवेश नहीं देना चाहता था। साथ ही वह दक्षिण का सबसे शक्तिशाली शासक बना रहना चाहता था। इसके लिए उसने हमेशा मराठा एंव निजाम को एक नहीं होने दिया। ऐसी स्थिति में अंग्रेजों ने निजाम को अपने पक्ष में कर लिया। शक्ति का संतुलन अपनी ओर स्थापित किया। ऐसी ही स्थिति में प्रथम-आंग्ल मैसूर संघर्ष होता है और इस संघर्ष में अन्ततः हैदर अली जीत जाता है, अन्ततः मद्रास पर उसका नियंत्रण स्थापित होता है तथा मद्रास की संधि के साथ इस युद्ध की समाप्ति हो जाती है।

परिणाम – दोनों एक-दूसरे के जीत हुए प्रदेशों को वापस कर देते है तथा किसी भी बाहरी शक्ति का, दोनों पर आक्रमण करने के दौरान हम दोनों एक-दूसरे का सहयोग करेगें।

  • अंग्रेजों के मनोबल को हैदर अली ने बढ़ाया तथा उसे मनोवैज्ञानिक बढ़ोतरी दी। साथ ही साथ उसे रणनीति बनाने के लिए एक अतिरिक्त समय प्रदान किया।
  • दोनों ने एक-दूसरे को मित्रता का आश्वासन दिया। लेकिन जहाँ हैदर अली ने मित्रता को वास्तविक समझा वहीं अंग्रेजों ने इसे छदम बना दिया।

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