अंतरिक्ष की दुनिया में बढ़ते भारत के कदम

“अंतरिक्ष की दुनिया में बढ़ते भारत के कदम”

अंतरिक्ष का विषय संभावनाओं और जिज्ञासाओं से भरा हुआ। इस संदर्भ में शुरूआत कहानी से करते है। मोनू एक बार खुले आकाश के नीचे सो रहा था तब उसने तारों को टिमटिमाते हुए देखा तो अपने पिताजी से पूछने लगा कि पापाजी तारे मुझे बुला रहे है तो उन्होनें कहा कि बेटा तारों के साथ चन्दा मामा के पास भी जाकर जरूर आना। (क्योंकि बालमन को जिज्ञासु बनाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ प्रचलित किवदंती है कि चन्द्रमा पर गाय है और वहॉ पर भी पेड़-पौधे है) तभी मोनू ने पापा से पूछा कि वहॉ पर मैं कैसे जा सकता हूॅ। कुछ संकोची स्वभाव में पिताजी ने कहा कि इसके लिए पढ़ना पढ़ता है और इसरो में वैज्ञानिक बनना होगा। तभी मोनू ने बेबाक अंदाज में कहा कि पापा मैं तैयार हूॅ।

              वस्तुतः उपर्युक्त प्रसंग अंतरिक्ष के संदर्भ में अनेक क्षेत्रों को खोलता हुआ प्रतीत होता है। आज भारत में सबसे रोचक विषय है तो वह अंतरिक्ष ही है। स्वतंत्रता के बाद की बात है कि भारत स्वतंत्र कोमल सपनों के पंख को उड़ान लगाने के लिए मछुआरों के एक छोटे से गॉव थुम्बा (केरल) में रॉकेट को प्रेक्षपण के लिए ले जाने हेतु साईकिल का उपयोग किया गया जिस पर पूरी दूनियाँ का कहना था कि यह प्रयास केवल प्रयास ही रहेगें। लेकिन हमारे वैज्ञानिकों के मन में यह कसोट रही थी “वो जीना भी क्या है, जब भारत को अंतरिक्ष की दूनिया में अग्रणी न बना दे।” तब से लेकर आज तक लगातार अंतरिक्ष के इतिहास के पन्ने गढ़ते गए। स्वामी विवेकानंद ने कहा कि –

                  “आत्मविश्वासी पुरूष हमेशा इतिहास बनाते है और जिनमें आत्मविश्वास की कमी है वह हमेशा इतिहास बन जाते है।”

            वस्तुतः स्वतंत्रता के बाद अंतरिक्ष अनुसंधान के विषय पर विचार विमर्श को बल मिला और 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना हुई। यह विडम्बना ही थी कि तब तक रूस और अमेरिका चांद पर विचरण कर आए और हम शुरूआत के दौर में थे। लेकिन रोचक बात यह है कि आज हम प्रतिस्पर्धी की बेहतर भूमिका निर्वाह कर रहे है।

अंतरिक्ष में बढ़ते कदमों का लाभ- जो इस प्रकार है-

अंतरिक्ष की दुनिया में बढ़ते भारत के कदम - ShivaGStudyPoint

               उपरोक्त लाभ से भारत ने एक नई छवि को गढ़ा है। साथ ही भारत की प्रक्षेपण लागत कम तथा उसके सफलता की बारम्बारता ने भारत को उपग्रह प्रक्षेपण केन्द्र के रूप में स्थापित किया है जो देश के लिए शुभ संकेत है क्योंकि इसके माध्यम से भारत को विदेशी मुद्रा की आपूर्ति होगी क्योंकि विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण किया जाऐगा। अर्थात् भारत उपग्रह प्रक्षेपण के विस्तृत बाजार में बदलता जा रहा है। जैसे वर्ष 2017 के पीएसएलवी – 37 के माध्यम से 104 उपग्रहों का एक साथ प्रक्षेपण किया जो सफल रहा है। वैसे भी तो एशिया महाद्वीप में भारत और चीन इस क्षेत्र में अग्रणी है किन्तु चीन के द्वारा प्रक्षेपण काफी मंहगे स्तर पर किया जाता है। इसलिए भारत के पास एक अवसर है कि एशिया के छोटे-छोटे देशों के साथ सम्बंधों को सुधारने का अर्थात् अंतरिक्ष कार्यक्रम विदेशी सम्बंधों को मजबूत करने का भी माध्यम है जैसे दक्षिण एशिया उपग्रह (सार्क) इसके माध्यम से केरल पाकिस्तान को छोड़कर सभी देश सुविधा ले रहे है।

                जैसा कि इसकी विश्वसनीयता ने भारत को इस क्षेत्र में प्रमुख स्थान दिलाया है जिसका ही लाभ है कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में अनेक उपलब्धियाँ है जो इस प्रकार है –

  • मिशन मंगलयान अर्थात् मॉर्स आर्बिटर मिशन
  • मिशन चन्द्रयान 1
  • आईआरएनएसएस अर्थात् नाविक
  • पीएसएलवी – 37
  • कार्टोसेट – 2

इसके अलावा भी अनेक उपलब्धियाँ शामिल है। इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है जो –

             वर्ष 2014 में मंगलयान अपनी कक्षा में स्थापित हुआ। इस मिशन पर पूरे विश्व की नजरें टिक्की हुई थी क्योंकि यह सबसे सस्ते स्तर पर पहली बार में सफल होने जा रहा था। जैसा हमाने वैज्ञानिकों ने सोचा वैसा ही हुआ।

         वर्ष 2007-08 में मिशन चन्द्रयान को भेजकर चन्द्रमा पर अनुसंधान को प्रारम्भ किया जिसके तहत हमें उसके चट्टानी स्थल, गैस, पानी के बारे में जानकारी मिली है। इसी कारण वर्ष 2018 के अंत में (संभवतया) मिशन चन्द्रयान – 2 को भेजने की तैयारी है।

          भारत नाविक से पहले जीपीएस पर निर्भर था किन्तु यह प्रणाली की थी जिसके दोहरे नुकसान थे एक तो हमें उन्हें विदेशी मुद्रा देनी पड़ती थी जिसके कारण हमारे विदेशी मुद्रा भण्डार में कमी आती थी वहीं दूसरा विषय स्थितियों में हमें जानकारी उपलब्ध कराने से मना करता था जैसा कि कारगिल युद्ध 1999 में देखने को मिला था। इसलिए नाविक का प्रक्षेपण करके भारत के 1500 किमी के दायरे में नौवहन सुविधा उपलब्ध कराई जा सकेगी जिसके लाभ है –

  • देश की सीमाओं की सुरक्षा ओर मजबूत होगी।
  • नौवहन सुविधा में विश्वसनीयता पैदा होगी।
  • पड़ोसी देशों को इसकी सुविधा उपलब्ध कराकर विदेशी मुद्रा का अर्जन किया जा सकेगा।
  • पड़ोसी देशों की देश विरोधी गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सकेगी।

            वर्ष 2017 में भारत ने कार्टोसेट – 2 का प्रक्षेपण करके इसमें सफलता अर्जित की है कि हमारी पृथ्वी के संसाधनों के बारे में जानकारी प्राप्त करने तथा उसके ईष्टतम दोहन को सुनिश्चित करेगा।

          हाल ही में हमारे वैज्ञानिकों ने भारत के पहले एस्ट्रोप्लेनेट (K2 – 236)  की खोज की है। वस्तुतः सौरमंडल के ग्रह को तभी एस्ट्रोप्लेनेट कहा जाता है। जब वह किसी तारे की परिक्रमा कर रहा हो यह पृथ्वी से 600 प्रकाशवर्ष दूर है। साथ ही साथ इसरो ने अभी घोषणा की है कि वर्ष 2022 तक “गगनयान” भेजा जायेगा। इसके लिए हाल ही में क्रु यान, पुनः प्रक्षेपण यान के सफल प्रक्षेपण हुए है। वैसे देखा जाए तो लोगों के अंतरिक्ष में शेयर करने की दिलचस्पी ज्यादा है इसलिए यह कहा जाता है कि गगनयान के सफल प्रक्षेपण से भारत में अंतरिक्ष पर्यटन उद्योग का भविष्य उज्ज्वल है क्योंकि भारत में सबसे बड़ी बात है कि हमेशा कम लागत रखने का प्रयास किया जाता है।

             इसरो ने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में रोजगारों के सृजन के लिए घरेलु निजी सेक्टर को प्रक्षेपण यान, रॉकेट, इन्स्टुमेंट के निर्माण पर ध्यान देने को कहा गया। जिसके ऊपर अभी कार्य प्रारम्भ हुए है। इस प्रकार नाइक अपाचे से वर्तमान तक भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम का पल सुनहरा रहा है। नये भारत के सृजन में अंतरिक्ष अनुसंधान क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है। क्योंकि इससे सुरक्षा प्रणाली के सुदृढ़ होने, आपदा प्रबंधन, निगरानी में योगदान है।

लेकिन दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह कहना तर्क संगत होगा कि अंतरिक्ष अनुसंधान के समक्ष चुनौतियाँ भी मौजूद है जैसे –

  • सीमित संसाधन – इसरो के पास दो लॉच पैड ओर केवल एक व्हीकल असेंबली ही है।
  • लॉच की तैयारी के लिये कम समय मिल पाना।
  • चीन, रूस और यूएसए से प्रतिद्धंद्धिता।
  • कुछ हद तक आर्थिक संसाधन की चुनौती है।

वस्तुतः इसरो को इन चुनौतियों से पार पाते हुए निम्न कदम बढ़ाने चाहिए, जैसे –

  1. निजी भागीदारी को बढ़ाना।
  2. लॉच व्हीकल की लागत में कमी लाना।
  3. कार्यक्षेत्र में विस्तार करना।
  4. अंतरिक्ष बुनियादी ढॉचें का निर्माण करना इत्यादि।

            बेशक इनमें कोई दोहराय नहीं है कि भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में अपने पैर मजबूत किए है बल्कि पड़ौसी देशों के साथ अन्य देशों को भी अपनी सेवा उपलब्ध करा रहा है। वैसे तो जब गगनयान मिशन सफल होगा तो भारत का अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक नया अध्याय शुरू होगा। भारत आज भी पर्यटन के मामले में महती स्थिति को लिए हुआ है। वहीं जब अंतरिक्ष पर्यटन का विकास एक नये बाजार सृजक के रूप में होगा। इसरो के मोटो “मानव जाति की सेवा में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी” इसमें सार्थक भी हुआ है। वर्तमान में इसके विजन को “अंतरिक्ष विज्ञान अनुसंधान और ग्रहों की खोज के दौरान राष्ट्रीय विकास के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग करना हमारी दृष्टि है।” स्वीकार किया।

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