भारत तथा विश्व के नैतिक विचारकों तथा दार्शनिकों का योगदान

भारत तथा विश्व के नैतिक विचारकों तथा दार्शनिकों का योगदान

सद्गुण का सिद्धांत:- यह गुण चरित्र की विशेष स्थिति है। यह वह स्थायी मानसिक प्रवृति है जो विवेकपूर्ण है। सद्गुण के प्रकार:- 1. नैतिक 2. बौद्धिक
– इसका सम्बन्ध भावनाओं से है।
– संवेदनाओं को विवेक के नियंत्रण में रखकर कार्य करना ही नैतिक सद्गुण है।
– इसका सम्बन्ध ऐच्छिक कर्म है।                 

प्लेटों और अरस्तु :- के अनुसार सद्गुण का मुख्य उद्धेश्य सामाजिक समरसता है।
प्लेटों के अनुसार शुभ सद्गुण :- 1. विवेक 2. साहस 3. संयम 4. न्याय

सुकरात:- सद्गुण को ज्ञान से जोड़कर देखा है। ज्ञान के अभाव में सदगुण के प्रकार वस्तुतः व्यर्थ होते है। अर्थात् सदगुण ज्ञान है।

अरस्तु:- अरस्तु के अनुसार सदगुण निम्न प्रकार से होता है:-
सदगुण सुख साध्य होता है।
– विवेकीय व्यवहार से अर्थात् आत्मज्ञान से मनुष्य अपनी भावना संवेग इत्यादि को नियंत्रित कर सकता है।
– सद्गुण शारीरिक सुख से ज्यादा, आत्मा के सुख और परमानन्द जैसे लक्षणों से युक्त होता है।

“शत्रुओं पर विजय पाने की अपेक्षा में अपनी इच्छाओं का दमन करने वाले को अधिक साहसी मानता हँू।” – अरस्तु

उपयोगितावाद:- इसके अंतर्गत उस क्रिया को शामिल किया जाता है कि अधिकतम लोगों का लाभ हो। अर्थात् क्रिया वही उचित या नैतिक है यदि वह शुभ परिणाम को उत्पन्न करती है।
प्रत्येक व्यक्ति को वैसे कर्म का सम्पादन करना चाहिये जिससे हर एक व्यक्ति को अधिकतम आनन्द प्राप्त हो।
समर्थक – 1. जेरेमी बैंथम 2. मिल

बेंथम:- बेथम का उपयोगितावाद को सफल पदार्थवाद भी कहते है। बेंथम के अनुसार अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। बेंथम सुखों में गुणात्मक भेद नहीं मानते।

मिल:- मिल का मत सुखदायी है। अतः मिल के अनुसार कोई कर्म उसी अनुपात में उचित है जिस अनुपात में उससे आनंद की प्राप्ति होती है। मिल सुखदायी पदार्थवादी है। मिल ने सुखों में गुणात्मक भेद को माना है।

कांट का नीतिशास्त्रीय सिद्धांत:- कांट के नीतिशास्त्रीय सिद्धांत को कर्तव्या-कर्तव्य का सिद्धांत भी कहते है। इस सिद्धांत का केन्द्र बिन्दु अनुभव, भावना या फिर कर्म का लक्ष्य नहीं बल्कि विशुद्ध कर्तव्य के लिए कर्तव्य है।
                              अर्थात् कांट का मानना है कि हमें कोई कर्म इसलिए नहीं करना चाहिए कि उससे हमें सुख मिलता है बल्कि कर्म को कर्तव्य समझकर करना चाहिए।

रूसो:- रूसों की सामान्य इच्छा की संकल्पना में व्यक्ति की दो प्रकार की इच्छाओं का वर्णन किया गया है।
– Actual will – स्वार्थगत भावना से युक्त।
– Real will – विवेकीय ज्ञान के आधार पर सामाजिक हितों से संबंधित है।

सामान्य इच्छा की अवधारणा:-
1- इसमें एकता देखन को मिलती है।
2- यह सम्प्रभुताधारी होती है क्योंकि निष्काम भावना से इसका लक्ष्य जनहित में विधि निर्माण करना है।
3- इसमें स्थायित्व देखने को मिलता है।
4- इसमें राष्ट्रीय चरित्र देखने को मिलता है।
5- इसका लक्ष्य कल्याणकारी होता है।

महात्मा गाँधी:- महात्मा गाँधी के जीवन का केन्द्रीय दर्शन नैतिक शिक्षा से है। उनका मानना था कि नैतिक और आध्यात्मिक स्थिति में सत्य के साथ प्रतिदिन जीवन का विकास करना चाहिए। वे आचरण के एक ही मानक में विश्वास करते थे, इसीलिए उन्होनें सत्य और अहिंसा के धर्म को स्थापित किया।
जब तक हिंसा की विभिन्न रूपों में अभिव्यक्ति होती रहेगी, तब तक गाँधी प्रासंगिक बने रहेगें।
गाँधी द्वारा कहा गया कि मानव जीवन में सात घातक पाप है जो निम्न है:-
1- कार्य के बिना धन।
2- चरित्र के बिना ज्ञान।
3- सिद्धांत के बिना राजनीति।
4- विवेक के बिना सुख।
5- नैतिकता के बिना वाणिज्य।
6- मानवता के बिना विज्ञान।
7- बलिदान के बिना धर्म।

विचार:-  “ताकत शारीरिक क्षमता से नहीं बल्कि अदम्य इच्छाशक्ति से उत्पन्न होती है। – गाँधी
पृथ्वी पर हर एक व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति के लिए काफी है पर किसी लालच के लिए कुछ भी नहीं।” – गाँधी
“यदि धन खोया तो कुछ नहीं खोया, स्वास्थ्य खो दिया तो कुछ खो दिया, अगर चरित्र खो दिया तो सब कुछ खो दिया।” – महात्मा गाँधी
“ऐसे जियो की तुम कल ही मरने वाले हो, सीखो ऐसे जैसे कि तुम हमेशा रहने वाले हो। – गाँधी
गहरी प्रतिबद्धता से बोला गया एक नहीं केवल खुश करने या समस्या टालने के लिए बोले गए हां से बेहतर है।” – गाँधी

ए.पी.जे. अब्दुल कलाम:-
1- मानव को समस्याओं की जरूरत है, क्योंकि वे सफलता का आनंद लेने के लिए आवश्यक है।
2- भारत को अपनी छाया के साथ ही चलना चाहिए – हमारा विकास माॅडल अपना होना चाहिए।
3- यदि तुम एक सूर्य की तरह चमकना चाहते हो तो पहले एक सूर्य की तरह जलो।

दीनदयाल उपाध्याय:-
“स्वतंत्रता केवल तभी अर्थपूर्ण हो सकती है यदि वह हमारी संस्कृति की अभिव्यक्ति का औजार बने।”
“भारतीय संस्कृति का मूल चरित्र जीवन को संपूर्ण समग्र रूप से देखना है।”
“शक्ति अनियंत्रित विचारों में नहीं बल्कि अच्छी तरह से विनियमित कार्यों में निर्भर करती है।”
                               नये भारत के लिये संकल्प से सिद्धि कार्यक्रम के पीछे की प्रेरणा और आधार एकात्म मानववाद का दर्शन ही है।

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