राजनीति का अपराधीकरण : भारतीय लोकतंत्र

“राजनीति का अपराधीकरण : भारतीय लोकतंत्र”

राजनीति के अपराधीकरण का अर्थ है कि राजनैतिक सत्ता में बने रहने के लिये अपराध का सहारा लिया जाता है। अर्थात् सत्ता का सुख भोगने के लिये गैर संवैधानिक एवं अनुचित तरीकों का सहारा लेना। वहीं इसके साथ-साथ एक शब्द हमेशा चर्चा का विषय रहा है कि अपराध का राजनीतिकरण अर्थात् अब अपराधी लोगों का राजनीति में प्रवेश होने लगा है, जो एक संवैधानिक लोकतंत्र में खतरनाक है।

              हम इस निबंध की शुरूआत एक पत्रकार और आम मतदाता के मध्य हुए संवाद की कहानी प्रारूप से करते है जो इस शीर्षक को अपने अर्थों में समेटते हुए है जो –

             “एक बार पत्रकार लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में ग्रामीण अंचल के दौर पर था, आम चुनाव नजदीक थे तो पत्रकार ने ग्रामीण मतदाताओं से पूछा कि आम चुनाव में आप अपने मत को बेचते है या स्वविवेक से उपयोग करते है तब हर एक के जुबान पर सीधा सा जवाब था कि बाबूजी हमें क्या मतलब कि कौन जीते, कौन हारे। बस हमें जो पैसा, मोबाइल, फ्रिज, टीवी इत्यादि फ्री में देगा हम तो उसे वोट देगें। तभी पत्रकार ने दूसरा सवाल किया कि आपके क्षेत्र में आप स्वच्छ छवि वाले नेता को चुनते हो या अपराधी पृष्ठभूमि के। उसी समय आम मतदाताओं ने एक स्वर में मुस्कराकर जवाब दिया कि खुंखार नेता के बिना हमारी बात कोई नहीं सूनता जी ! साथ ही वह हमारे मसीहा है क्योंकि पैसा देता है।”

              उपर्युक्त संवाद मानों लोकतंत्र में नागरिक भ्रष्टाचार के प्रति मौन, मूक बधिर, असहाय की छवि को दर्शाता है कि यही उसकी नियति में है। जब हम स्वतंत्रता आंदोलन के समय की बात करें तो प्रत्येक सेनानी ने अपने भाग्यविधाता को स्वयं के द्वारा चुनने के अधिकार के खातिर ब्रिटिशों से लोहा लिया ओर स्वतंत्रता के बाद इस मुहिम को सफल बनाने में भी सफल हुए क्योंकि हमारे संविधान में न जाति, न धर्म, न अमीर, न गरीब, न महिला, न पुरूष का भेदभाव किए बिना सभी को वोट का अधिकार दिया है। जो ब्रिटेन एवं संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों से कई आगे का कदम था।

             महात्मा गाँधी जी ने रामराज्य की कल्पना करते हुए कहा था अनुशासित व स्वच्छ राजनीति सबसे बढ़िया व्यवस्था है ओर इसके विपरीत व्यवस्था होने पर यह अराजकता को जन्म देती है। जिस देश में सबके कल्याण का जिम्मा कार्यपालिका एवं विधायिका को दिया उसी में अब अपराधी लोगों के प्रवेश से सेंध लगनी शुरू हो गयी है। यह अपने आप में दर्शाता है कि अब वह समय दूर नहीं है जहाँ स्वार्थों की राजनीति में सामान्य जन का नाश सुनिश्चित है।

               प्रश्न यह उठता है कि मात्र वोट देना अधिकार है ? क्या वोट एक कर्त्तव्य है या स्वार्थ सिद्धी का माध्यम ? वैसे तो देखा जाये तो एक लोकतंत्रिक देश में मतदान दिवस को लोकतंत्र के उत्सव की भांति मनाया जाता है क्योंकि यह अधिकार को दर्शाता है। कोई कल्पना नहीं है कि इस अधिकार को देने वाले हम है और लेने वाले भी हम है क्योंकि अंगूली पर लगा निशान इस अधिकार पर मोहर लगाता है कि हम हिन्दुस्तानी इस मुल्क के नागरिक ही नहीं बल्कि भाग्यविधाता भी है। रूसों ने कहा कि कर्त्तव्यों के प्रांगण में अधिकार पल्लिवित एवं पुष्पित होते है। वोट देना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार होने के साथ एक कर्त्तव्यबोध भी है क्योंकि कर्त्तव्य यह है कि कानून निर्मात्री संस्था में हमेशा स्वच्छ छवि एवं बेदाग लोगों को भेजा जाए। लेकिन मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि आज चुनाव में वोट को बेच दिया जाता है। अपनी जाति के अपराधी, धनबल, बाहुबल सम्पन्न लोगों को पवित्र संस्था में चुनकर भेजा जाता है जो दोहरी छवि वाले होते है क्योंकि गाढ़ी कमाई का पैसा लूटकर कुछ खैरात के रूप में सामान्य जन में बांटकर अपने वास्तविक स्वरूप कुछ ओर है। इसलिए कहा जा सकता है कि पहले राजा के अनुरूप प्रजा होती थी आज प्रजा के अनुरूप राजा (जनप्रतिनिधि) है।

             राजनीति के अपराधीकरण पर “सत्यमेव जयते” जैसे सामाजिक सरोकार को बढ़ाने वाले कार्यक्रम में प्रकाश डाला गया है। जिसमें संदर्भित एक रिसर्च में बताया गया कि यदि कोई स्वच्छ छवि का उम्मीदवार चुनाव में खड़ा है तो उसके जीतने की संभावना मात्र 7 प्रतिशत है, व्यक्ति उम्मीदवार है तो उसके जीतने की संभावना 19 प्रतिशत है और कोई बड़े अपराध में संलग्न कोई उम्मीदवार है तो उसके जीतने की संभावना 25 प्रतिशत तक बढ़ा देती है।

              अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि प्रभावी रूप से आर्थिक हानि के साथ-साथ लोकतंत्र कमजोर होता है।

               इसलिए तो संवैधानिक लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी होने के नाते सुप्रीम कोर्ट ने अनेकों बार राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के निर्देश दिए किन्तु इसके बावजूद आज तक ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि भारतीय राजनीतिक दल स बात पर सभी एकमत है कि राजनीति के सम्बंध में जो अपराध की बात कही जा रही है वह गलत है। इसको एक उदाहरण से समझ सकते है जैसे 1998 में एडीआर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है कि संसद एवं विधानमंडल के कितने सदस्यों पर आपराधिक मुकदमें दायर है, लेकिन सरकार के साथ सभी राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करके याचिका खारिज करने की वकालत की किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने 2001 में फैसला दिया कि प्रत्येक उम्मीदवार नामांकन दाखिल करते समय अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि का ब्यौरा देगें। वस्तुतः सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए निम्न निर्णय दिए है जो इस प्रकार है –

  • 2001 में नामांकन में उम्मीदवार को अपराधिक पृष्ठभूमि देने का फैसला।
  • 2 वर्ष की सजा होने पर उस विधायक या एसपी की सदस्यता रद्द तथा अगले 6 वर्ष तक चुनाव नहीं लड़ सकेगा।

            1970 के दशक के अंत में राजनीति में अपराधीकरण एवं अपराध का राजनीतिकरण तेजी से बढ़ा है। इससे पहले बूथ कैप्चरिंग की घटना होती थी लेकिन इसके बाद से धीरे-धीरे अस्थायी सरकारों के गठन का दौर शुरू हो जाता है। ऐसे में स्थायी सरकार के लिये राजनीतिक दलों को जीताऊ उम्मीदवार की जरूरत महसूस होने लगी, इसी का ही परिणाम था कि प्रत्येक राजनीतिक दल जिसके पास धनबल और बाहुबल है उसको चुनाव में टिकट देने लगी, उसी का ही परिणाम आज विभित्स रूप धारण कर लोकतंत्र को खोखला कर रहा है।

         प्रश्न यह उठता है कि राजनीति का अपराधीकरण का क्या – क्या प्रभाव है ? वस्तुतः यह इस प्रकार है –

राजनीति का अपराधीकरण : भारतीय लोकतंत्र - ShivaGStudyPoint

  • लिली थौमस बनाम भारत संघवाद में 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोषी ठहराए जाने पर खुद-ब-खुद सांसद या विधायक अपने पद से वंचित, लेकिन ऊपरी न्यायालय में अपील की स्थिति में पद पर बना रह सकता है।
  • 2018 में लोकप्रहरी एनजीओ की जनहित याचिका के सम्बंध में यह निर्णय दिया कि
  • A. राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार पार्टी को अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि बताएगा।
  • B. सम्बंधित राजनीतिक दल उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि का ब्यौरा वेबसाइट पर डालेगा।
  • C. अखबार एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में व्यापक प्रचार इसका करेंगे।
  • वर्ष 2013 में चुनाव में नोटा के विकल्प को देने के सम्बंध में फैसला ताकि दल दागी उम्मीदवार को टिकट न दे।

          इसी के साथ ही निर्वाचन आयोग भी लगातार सक्रिय है कि स्वच्छ एवं स्वस्थ लोकतंत्र की स्थापना हो इसके लिए –

  1. चुनाव के समय प्रभावी तंत्र से चुनाव निगरानी करने पर बल दिया जा रहा है। ताकि चुनाव में धनबल का प्रयोग नहीं हो रहा है।
  2. नामांकन में आपराधिक पृष्ठभूमि के सम्बंध में गलत सूचना पर कार्यवाई करना।
  3. समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इस मुद्दे को उठाना कि राजनीति का अपराधीकरण समाप्त हो।

               पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ. एस. वाई. कुरैशी ने बताया कि हमारे द्वारा उम्मीदवार के विरूद्ध केस दायर किए गए लेकिन सरकार के बनने के बाद इन सभी केसों को समाप्त करने का निर्णय सरकार ने लिया किन्तु हमने सुप्रीम कोर्ट में जाकर इसको नहीं होने दिया। वस्तुतः यह अपने आप में राजनीति के आपराधीकरण को समाप्त में राजनीतिक दृढ़इच्छाशक्ति के अभाव को दर्शाता है।

             इसलिए राजनीति के अपराधीकरण को समाप्त करने के निम्न सुझाव हो सकते है जो इस प्रकार है –

  1. न्यायपालिका – लंबित मामलों का समयबद्ध निस्तारण करें।
  2. यदि कोई उम्मीदवार चुनाव में हार जाता है किन्तु पहले वह सासंद या विधायक रह चुका।
  3. विधायिका द्वारा कानून बनाकर।
  4. मतदाता को ही जागरूक बनाना होगा कि कम से कम भाग्यविधाता तो बेदागी छवि वाला हो।

               बेशक इसमें कोई संदेह नहीं कि यह लोकतंत्र को नुकसान पहुँचा रहा है सरकारों के द्वारा राजनीतिक दृढ़इच्छाशक्ति को बताया नहीं जाना है कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को 12 विशेष अदालतें गठित करने का आदेश दिया ताकि मामलों को समय रहते निपटाया जा सके। एक सर्वे के अनुसार देश में नेताओं के खिलाफ मामलों के निस्तारण में कम से कम सात वर्ष लग जाते है। इसलिए सरकार के साथ आम मतदाताओं को भी सक्रिय सहभागिता निभाने की जरूरत है। वस्तुतः आज के फैसले से हम यह सीख लेगें कि हमारे देश के नेता भ्रष्ट है और उनकी वजह से आज हमारे देश की हालत ऐसी है तो यह गलत सीक्ष होगी क्योंकि बाजार तब खड़ा होता है जब खरीदने वाले एवं बेचने वाले दोनों मौजूद हो।

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