डिजिटल अर्थव्यवस्था

डिजिटल अर्थव्यवस्था : आर्थिक समताकारी समाज या आर्थिक विषमता का द्योतक

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सुधा और सुरज नाम के दो व्यक्ति थे क्रमशः सुधा शिक्षित परिवार से था और स्वयं भी अच्छी शिक्षा ग्रहण कर चुका था वहीं सुरज किसान का बेटा होने के नाते ज्यादा नहीं पढ़ पाया था। सुधा ने डिजिटल अर्थव्यवस्था के महत्व को समझकर सारे कार्य इससे करने लगा जिससे वह एक अच्छी स्थिति को प्राप्त कर सकने में सफल हुआ किन्तु कुछ समय के बाद सुधा का डिजिटल अर्थव्यवस्था से मन भर गया क्योंकि वह अवैध तरीके इसमें नहीं अपना सकता था। इसने वापस नकद आधारित अर्थव्यवस्था की ओर चल पड़ा। वहीं दूसरी ओर सुरज के कम पढ़े लिखे होने के बावजूद डिजिटल अर्थव्यवस्था की जागरूकता से परिचित हुआ और अपने परिवार के साथ-साथ पूरे समाज को सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभार्थी बना दिया, साथ कृषि उत्पादों का वाजिब दाम अर्जित करने में भी सफल हुआ।

             उपरोक्त प्रसंग डिजिटल अर्थव्यवस्था के महत्व को सारगर्भित कर रहा है। वस्तुतः 2015 में भारत को सशक्त भारत बनाने के लिए डिजिटल योजना को शुरू किया गया है। सभी योजनाओं को डिजिटल क्रांति से जोड़कर प्रस्तावना को मूर्त रूप देने का कार्य किया गया है।

डिजिटल अर्थव्यवस्था समय की मांग है। इसके निम्नलिखित फायदे इंगित होते है जो इस प्रकार है –

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             जब हम डिजिटल अर्थव्यवस्था पर विचार कर रहे होते है तो सबसे पहले हमारे मन में प्रश्न उठता है कि यह आर्थिक समताकारी समाज की स्थापना कैसे करता है ? इस संदर्भ में इसकी चर्चा निम्न प्रकार से है –

           नकद आधारित अर्थव्यवस्था में कालेधन को बढ़ावा मिलता है जो कालाबाजारी, भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन देता है परिणामस्वरूप बाजार में मुद्रा की तरलता में वृद्धि हो जाती है जिसके कारण मंहगाई में वृद्धि होने लगती फलस्वरूप वंचित एवं गरीब लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर पाते है जिसके कारण आर्थिक समानता मूर्त रूप नहीं लेती है। इसलिए डिजिटल अर्थव्यवस्था कालेधन पर रोक लगा देगा। जिससे आर्थिक समताकारी समाज को निर्माण होगा।

            सरकार आर्थिक समताकारी समाज के निर्माण के लिए अनेक सारे प्रयास, यथा – सब्सिडी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मनरेगा, कर रही है किन्तु भारत में नकद आधारित अर्थव्यवस्था के कारण बिचौलियों के द्वारा इनके लाभ को वास्तविक लाभार्थी तक पहुँचने ही नहीं दिया जाता है। इसलिए डिजिटल आधारित अर्थव्यवस्था के लाभ का सीधे हस्तांतरण लाभार्थी के खाते में करता है जैसे – प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, पॉइट ऑफ सेल इत्यादि।

           संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित सामाजिक – राजनीतिक न्याय तभी मूर्त रूप लेंगे जब आर्थिक न्याय स्थापित हो इसके लिए या तो रोजगारों में वृद्धि होनी चाहिए या वित्तीय समावेशन पर बल दिया जाना चाहिए। किन्तु वित्तीय समावेशन के लिए डिजिटल अर्थव्यवस्था जरूरी है। इसके कारण प्रत्येक व्यक्ति का बैंकिंग में खाता होगा तथा लेनदेन सारे ऑनलॉइन वरीके से होगे जिससे आर्थिक समता का विकास होगा। डिजिटल अर्थव्यवस्था के संदर्भ में कहा जाता है कि इससे अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष प्रकार के रोजगारों में वृद्धि होगी। परिणामस्वरूप हमारे देश की जीडीपी में 2 से 3% तक वृद्धि हो सकती है।

           वैसे तो भारत ने अपने संविधान के नीति निर्देशक तत्वों को समाहित कर आर्थिक समानता को स्थापित करने का दायित्व राज्य पर छोड़ा गया है इसलिए तो भारत में लोककल्याणकारी राज्य की संकल्पना है। यह तभी संभव है जब राज्य के पास आर्थिक संसाधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो। इस दिशा में डिजिटल अर्थव्यवस्था एक महत्वपूर्ण कदम है क्योंकि इससे कर में चोरी रूकती है जिससे राजस्व संग्रह में वृद्धि होती है परिणामस्वरूप सरकार अनेक जनकल्याणकारी योजना का संचालन कर आर्थिक समताकारी समाज के निर्माण का प्रयास कर रही है। जैसे – आयुष्मान भारत, उज्ज्वला योजना।

               इस प्रकार देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था आर्थिक समताकारी समाज के निर्माण में सहायक है। सरकार नये भारत के निर्माण के लिए किसानों की आय को 2022 तक दोगुना करने का लक्ष्य रखा है जो डिजिटल अर्थव्यवस्था के बिना संभव सा नहीं है क्योंकि किसानों के उत्पादों को बिचौलियों से बचाने के लिए ऑनलॉइन बिक्री पर बल देना होगा इसी दिशा में सरकार ने “ई-नाम” और “ई-मंत्री” नामक कार्यक्रमों का संचालन किया है। इसके अभी तक कार्यों की समीक्षा इस दिशा के शुभसंकेतों की ओर इशारा कर रही है।

             वस्तुतः नये भारत का सृजन डिजिटल अर्थव्यवस्था से होगा। क्यों न इसको बेहतर गर्भनिरोधक माना जाए।

लेकिन दूसरे दृष्टिकोण से विचार किया जाए तो यह आर्थिक विषमता को बढ़ा भी सकता है क्योंकि –

  • अमीर लोग इससे बचने के लिए सेल कंपनियों का सहारा ले सकते है।
  • गरीब, अनपढ़ लोगों में इसकी साक्षरता का अभाव है। जो इसको अपनाने पर बल नहीं देगें।
  • डिजिटल अर्थव्यवस्था से अनेक क्षेत्रों में रोजगारों की कमी हो सकती है जो विषमता को बढ़ा सकती है।
  • क्षेत्रीय आधार पर आर्थिक विषमता बढ़ने की संभावना है।

             इसलिए एक वर्ग ने इस पर संदेह व्यक्त किया है। परन्तु डिजिटल अर्थव्यवस्था के समक्ष चुनौतियों की संख्या काफी है जो इसकी संज्ञेयता को बढ़ा देती है जैसे –

  • साइबर आक्रमण।
  • सभी क्षेत्रों में डिजिटल क्नेक्टिविटी।
  • प्रत्येक व्यक्ति तक हाईस्पीड की पहुँच।

           उपरोक्त कमियों और चुनौतियों के बाद भी इसका महत्व कम नहीं होता है। डिजिटल अर्थव्यवस्था आर्थिक समाताकारी समाज के निर्माण के साथ प्रत्येक स्तर पर सुशासन, ई-गवर्नेंस को मुमकिन करता है। इनके कारण समाज का कल्याण तो सुनिश्चित होता है साथ ही समाज नई प्रगति के पथ पर भी अग्रसर होता है। इसलिए ज्यादा से ज्यादा इस दिशा में होने चाहिए कि इसकी कमियों और चुनौतियों के प्रभाव को कम किया जा सके जिसके लिए राजनीतिक दृढ़इच्छाशक्ति के साथ प्रशासन की सक्रिय भागीदारी की जरूरत है। वैसे तो कहा जाता है कि यदि समाज समग्र रूप से सक्रिय है तो दोनों तो खुद-ब-खुद आ जाते है। बेशक डिजिटल अर्थव्यवस्था का मानवीकरण कर दिया जाए तो यह एक आर्थिक समताकारी समाज के सृजन में भागीदार होगा।

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