आर्थिक समीक्षा 2017-18

आर्थिक समीक्षा 2017-18

( विश्लेषण + प्रश्नोंत्तर )

-ः विषय सूची :-

  1. जीएसटी के परिप्रेक्ष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था का एक नूतन प्रबोधक
  2. निवेश एवं बचत में गिरावट और स्थिति में सुधार
  3. राजकोषीय संघवाद और जवाबदे में समन्वय
  4. क्या विकास में विलंबित अभिसृति एक बाधा बन सकती है ?
  5. कन्या नहीं, पुत्र चाहिए : क्या विकास ही इस समस्या का समाधान है ?
  6.  जलवायु परिवर्तन और कृषि
  7. भारत में विज्ञान प्रौद्योगिकी का रूपान्तरण
  8. व्यवसाय करने को आसान बनाने का अगला मोर्चा : समय से न्याय

1. जीएसटी :- 

परिचय –

  • बाजार सृजन
  • कर आधार में वृद्धि
  • सहकारी संघवाद
  • अप्रत्यक्ष करदाताओं की संख्या में वृद्धि
  • राज्यों के बीच जीएसटी आधार का संवितरण उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद से मजबूती से जुड़ा
  • निर्यात आंकड़ों एवं राज्य के लोगों के जीवन स्तर के बीच एक मजबूत सहसंबध विद्यमान
  • देश में सर्वाधिक बड़ी श्रेणी के प्रतिष्ठानों की निर्यात में भागीदारी काफी कम है।
  • औपचारिक रूप से कृषि से भिन्न क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों में पेरोल पर काम कर रहे कर्मचारियों की संख्या मौजूदा अनूमान की तुलना में पर्याप्त व्यापक।

कंपोजिशन स्कीम इस योजना के अंतर्गत पंजीकृत करदाता (1.5 करोड़ रूपये से कम के कारोबार वाले) अपने कारोबार पर अल्प कर का (1%,  2%, 5%) भूगतान करते है।

जीएसटी तथा करदाता

  • पंजीकृत अप्रत्यक्ष करदाताओं की संख्या में वृद्धि Total = 9.8 मिलियन (3.4 मिलियन नये + 6.4 मिलियन पुराने)
  • नए करदाताओं का प्रोफाइल – B to C = व्यापार कुल का 17% and B to B  निर्यात  = 30-40%
  • इसका स्वैच्छिक अनुपालन  जिसकी आय कर हेतु निर्धारित सीमा से कम है 1.7 मिलियन पंजीयक।
  • 1.6 मिलियन करदाता – मिश्रित स्कीम के तहत पंजीकृत प्रशासनिक बोझ कम परन्तु बड़े प्रतिष्ठानों के साथ कठिनाई। सीमा 1.5 करोड़ रू । अपने टर्नओवर पर कम कर का भुगतान । इनको इनपुअ टैक्स क्रेडिट नहीं।
  • MH, UP, TN, GJ States – जीएसटी पंजीकृतों की संख्या सबसे अधिक।
  • UP, WB States – कर पंजीयकों की संख्या में पुरानी कर व्यवस्था की तुलना में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज। www.shivagstudypoint.com

जीएसटी का कर आधार प्रभाव

  • GST कर आधार (निर्यात छोड़कर) 65-70 लाख करोड़ रू है।
  • जीएसटी आधार में राज्यवार स्थिति – MH-16%, TN-10%, KA-9%, UP-7%, GJ-6%
  • MH+GJ -विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी कम तथा सेवा क्षेत्र में ज्यादा।

पारस्परिक लेनदेनों के वितरण पर प्रभाव

  • न्यूनतम सीमा से नीचे की पंजीकृत फर्मों की संख्या में कुल फर्मों की 32% है परन्तु कारोबार में 1% से कम योगदान।
  • बड़ी फर्मे 1% भी कम है लेकिन कारोबार का 66% तथा कर देयता में 54% योगदान।
  • छोटी फर्मे – B to C and B to B बराबर वाली।
  • बड़ी फर्मे – B to B ज्यादा लेनदेन and B to C कम लेनदेन वाली।
  • छोटी फर्मे स्वैच्छिक रूप से का अनुपालन करती है (B to C)। इसमें निष्कर्ष निकलता है कि वास्तव में बड़ी कंपनियों में आपूर्तिकर्ता होने मात्र के अतिरिक्त भागीदारी के और भी स्त्रोत है।
  • छोटी B to C फर्मे GST का हिस्सा इसलिए बनना चाहती है क्योंकि वे बड़े उद्यमों से खरीदती है।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार और आर्थिक संवृद्धि

  • राज्यों के अन्तर्राष्ट्रीय निर्यात के आंकड़े इस बात को सही सिद्ध करते है कि किसी राज्य का प्रतिव्यक्ति GSDP पर्याप्त सीमा तक GSDP में इसके निर्यात अंश से जुड़ा है।
  • आंतरिक व्यापार GDP का लगभग 60% है जो कि पिछले सर्वेक्षण में किए गए अनुमान से अधिक होने के साथ-साथ अन्य बड़े देशों की तुलना में भी अपेक्षाकृत अधिक है।
  • जो राज्य सर्वाधिक निर्यात करते है वही राज्य सर्वाधिक आयात भी करते है।
  • जो राज्य सर्वाधिक व्यापार करते है। वे सर्वाधिक प्रतिस्पर्धी भी है और व्यापार का सर्वाधिक अधिशेष भी अर्जित करते है। www.shivagstudypoint.com

भारतीय अर्थव्यवस्था की अनौपचारिकता :-

  • फर्मों द्वारा प्रदान की गई सामाजिक सुरक्षा।
  • कर व्यवस्था के अन्तर्गत।
  • पेंशन तथा भविष्य निधि के रूप में।
  • चिकित्सा लाभ के सम्बंध में कर्मचारी राज्य बीमा निगम

औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्रक की परिभाषा

  • कर्मचारी का औपचारिक अनुबंध है या नहीं।
  • कोई कर्मचारी नियमित वेतनभोगी है या नहीं।
  • कर्मचारी को सामाजिक सुरक्षा प्राप्त है या नहीं।
  • वह फर्म सरकार की किसी शाखा के साथ पंजीकृत है या नहीं।

अन्तर्राज्यीय व्यापार के आंकड़े

  • पांच राज्य – महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडू तथा तेंलगाना इसी क्रम में भारत का 70% निर्यात।
  • पांच सबसे बड़े आयातक राज्य महाराष्ट्र, तमिलनाडू, यूपी, कर्नाटक एवं गुजरात है।
  • सर्वाधिक आंतरिक व्यापार अधिशेष वाले राज्य गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, ओडिशा एवं तमिलनाडू।

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Que. 1. जीएसटी एक ऐसी व्यापक व्यवस्था है जो भारतीय अर्थव्यवस्था को समझने की दिशा में एक आमूल परिवर्तन तथा विस्तार को साकार रूप प्रदान करता है। इस कथन के आलोक में जीएसटी भारतीय अर्थव्यवस्था का एक नूतन प्रबोधक कैसे है ? स्पष्ट कीजिए।

Ans. जीएसटी सरकार द्वारा की गई एक ऐसी व्यापक व्यवस्था है जिसके कारण इससे पहली व्यवस्था और बाद की व्यवस्था में स्पष्ट विभाजन दिखाई देता है। इसी का ही परिणाम है कि इसको व्यापक जनसमर्थन मिला क्योंकि –

  • भारतीय बाजार का सृजन हुआ।
  • कर आधार का विस्तार।  www.shivagstudypoint.com
  • सहकारी संघवाद मजबूत।

      जीएसटी भारतीय अर्थव्यवस्था को समझने की दिशा में एक आमूल परिवर्तन तथा विस्तार को साकार रूप प्रदान करता है क्योंकि –

  • जीएसटी से सूचना का एक बड़ा निक्षेपागार सृजित होगा जिससे हमारी सोच में विस्तार होगा तथा उसमें बदलाव के कदम उठाएं जाऐगें।
  • सूचनाओं के विश्लेषण से निष्कर्ष निकालकर उपभोक्ताओं की इच्छा एवं उत्पादकों की आकांक्षा के अनुरूप इसमें परिवर्तन आसानी से किया जा सकेगा। परिणामस्वरूप कर संग्रह में वृद्धि होगी।

         वस्तुतः जीएसटी भारतीय अर्थव्यवस्था का एक नूतन प्रबोधक है क्योंकि –

  • जीएसटी ने बताया कि भारतीय बाजार को सृजित करने की क्षमता विद्यमान है।
  • जीएसटी ने सरकार को बताया कि कर राजस्व में वृद्धि तथा कर आधार में वृद्धि होगी।
  • इसने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार, अंतर-राज्य व्यापार को बढ़ाया है।
  • उपभोक्ताओं के साथ उत्पादक को लाभ।
  • सहकारी संघवाद मजबूत हुआ।

         बेशक जीएसटी आर्थिक सुधारों की दिशा में बहुत ही बड़ा सुधार है जो अर्थव्यवस्था को स्थायित्व देगा।

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Que. 2. जीएसटी पर्यावरण संरक्षण की गांरटी है, वहीं दूसरी ओर सहकारी संघवाद को मजबूत करता है उपर्युक्त कथन के आलोक में जीएसटी का मूल्यांकन कीजिए।

Ans. जीएसटी पर्यावरण संरक्षण की गारंटी है क्योंकि –

  1. जीएसटी की प्रक्रिया को ऑनलाइन बनाया गया है जिसके कारण कागज का उपयोग कम होगा परिणाम स्वरूप पेड़-पौधों की कटाई नहीं होगी। www.shivagstudypoint.com
  2. जीएसटी के तहत ही ई-वे बिल को अपनाया गया जिसके कारण आवागमन बाधित नहीं होगा जिससे जीवाष्म ईंधनों की बचत होगी परिणामस्वरूप पर्यावरण संरक्षण होगा।

  वहीं दूसरी ओर सहकारी संघवाद को मजबूत करता है क्योंकि –

  1. जीएसटी परिषद् में निर्णय राज्यों से विचार विमर्श करने के बाद लिए जाते है। अर्थात् राज्यों की सहभागिता सहकारी संघवाद को मजबूत करती है।
  2. जीएसटी परिषद् में लिए जाने वाले निर्णयों में राज्यों को अधिक भार दिया (2/3) गया है।
  3. राज्यों में आपस में व्यापार में बढ़ोतरी होगी जिससे सम्बंध अच्छे होंगे।

       वस्तुतः भारत में जीएसटी का मूल्यांकन किया जाए तो यह कहना तर्कसंगत होगा कि जीएसटी आर्थिक संवृद्धि, बाजार सृजक, उपभोक्ताओं के हित में पर्यावरण संरक्षण और सूचना के निक्षेपागार के रूप में सफल हुआ है परिणाम यह रहा है कि हमारे संविधान की प्रस्तावना को मूर्त रूप देने का एक सशक्त कदम है। लेकिन पिछले एक वर्ष में तकनीकी समस्या के कारण कुछ स्तरों पर इसको नकारात्मक अभिवृत्ति का सामना करना पड़ा।

2. निवेश और बचत में गिरावट और स्थिति में सुधार : भारत के संबंध में विभिन्न देशों का अनुभव

परिचय

  • इन प्रत्याशाओं में यह दृढ़ विश्वास निहित है कि घरेलू बचत और निवेश में शीघ्र ही तेजी आने वाली है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को 8-10% की संवृद्धि दर प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। www.shivagstudypoint.com
  • हाल ही में भारत में आई बचत / निवेश में गिरावट के पीछे प्रमुख कारक निजी निवेश और पारिवारिक/सरकारी बचत में आयी गिरावट थी।

निवेश और बचत में शिथिलता की पहचान – कई प्रमुख कारक है –

  • भारत का हालिया निवेश/बचत मंदी का दौर अन्य मामलों में लम्बा रहा है और अभी भी यह समाप्त नहीं हुआ है।
  • निवेश और बचत में आई कमी की अवधियों में समानता हो सकती है। किन्तु निवेश में मंदी के घटनाक्रम अधिक गहन रहे है तथा इसकी गहनता चरम अवस्था के लिए अधिक प्रवण है।
  • निवेश को पुनः बढ़ाने हेतु वैश्विक वित्तीय संकट के बाद प्रोत्साहन तथा अन्य नीतियों के माध्यम से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के ठोस प्रयासों के चलते हाल ही में लिवेश घटनाक्रमों की संख्या में अपेक्षाकृत कमी आयी है।

बचत बनाम निवेश : संवृद्धि पर प्रभाव – सर्वे यह बताता है कि विकास को बढ़ावा देने हेतु नीतियों को बचत के बजाय निवेश के प्रोत्साहन पर अधिक ध्यान देना चाहिए। जिससे –

  1. रोजगारों में वृद्धि होगी।
  2. प्रतिव्यक्ति में वृद्धि होगी।
  3. औद्योगीकरण होगा।
  4. गरीबी में कमी होगी।
  5. निवेश बढ़ेगा।
  6. बचत में वृद्धि होगी।
  7. बाजार में मांग का सृजन होगा।

निवेश में भारत जैसी गिरावट से उबर पाना

  • परिणाम के संदर्भ में यह अपेक्षाकृत मध्यम, लंबी समयावधि एवं इसका आरंभ GDP की 36% की अपेक्षाकृत उँची दर से हुआ।
  • बैलेंस शीट से संबंधित मंदी है। इससे लाभ नहीं जिससे ये पुराने ऋणों का भुगतान करने में भी असमर्थ हो गए।  www.shivagstudypoint.com

उपाय

  • व्यापार करने की लागत को घटाना होगा, जिससे लाभ में वृद्धि होगी परिणामतः बचत, निवेश में रूपान्तरित होगी।
  • एक स्पष्ट, पारदर्शी एवं स्थिर कर व विनियामक वातावरण बनाना।
  • MSME को समृद्ध करने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करन।
  • छोटे-बड़े दोनों उद्योगों पर निवेश प्रोत्साहन परक नीतियों पर ध्यान देना होगा।

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Que. 3. क्या बचत किसी देश की आर्थिक संवृद्धि की गांरटी है ? आर्थिक संवृद्धि के लिये ओर कौनसे कारक जिम्मेदार है ?

Ans. आर्थिक् संवृद्धि से तात्पर्य उत्पादन में वृद्धि अर्थात् जीडीपी में वृद्धि।

बचत किसी देश की आर्थिक संवृद्धि की गांरटी है क्योंकि –

  1. बचत ही निवेश में रूपान्तरित होती है जिससे संवृद्धि होती है।
  2. बचत के निवेश में बदलने पर औद्योगीकरण को बल मिलता है जिससे पूँजी निर्माण होता है।
  3. बचत ही अर्थव्यवस्था में मांग को बढ़ाती है जिससे बाजार में नये निवेशक निवेश करते है।

            किन्तु यह कहना पूर्णतः तर्कसंगत नहीं होगा कि बचत, आर्थिक संवृद्धि की गांरटी है क्योंकि –

  1. किसी देश में बचत तो बहुत ज्यादा होती है जबकि निवेश नहीं। परिणामतः संवृद्धि नहीं।
  2. बचत का गतिशीलन होगा आवश्यक है यदि गतिशीलन का अथाव है तो निवेश का रूप धारण नहीं होगा। www.shivagstudypoint.com

               इसलिए आर्थिक सर्वे में बचत की अपेक्षा निवेश को आर्थिक संवृद्धि का मुख्य कारक माना है।

आर्थिक संवृद्धि के लिए निम्न कारक जिम्मेदार है जैसे –

  • पूँजी निर्माण
  • संसाधन मानव प्राकृतिक
  • आधारभूत संरचना का बेहतर विकास
  • प्रौद्योगिकी

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Que. 4. घरेलू बचत और निवेश ही आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास की गांरटी है। बचत और निवेश को बढ़ाने के लिए उपायों की चर्चा कीजिए।

Ans. घरेलू बचत और निवेश की आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास की गांरटी है क्योंकि –

  • इसके कारण देश में औद्योगीकरण होगा जिससे रोजगारों का सृजन होगा फलस्वरूप स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा जिससे आर्थिक संवृद्धि के साथ आर्थिक विकास भी होगा।
  • इसके कारण होने वाला लाभ देश के बाहर नहीं जाऐगा जिससे लाभ का वितरण होने से आर्थिक विकास होगा।
  • इसके कारण सरकार को राजस्व की प्राप्ति ज्यादा होगी जिसके कारण सरकार कल्याणकारी योजनाओं का संचालन कर सकेगी। www.shivagstudypoint.com

        किन्तु विदेशी निवेश भी आर्थिक संवृद्धि एवं आर्थिक विकास की गांरटी है क्योंकि इसके लिए शर्त है – जैसे

  • विदेशी निवेश से उत्पन्न रोजगारों पर उस देश के नागरिकों को वरीयता हो।
  • विदेशी निवेश से प्राप्त राजस्व का कल्याणार्थ उपयोग हो।

वस्तुतः बचत एवं निवेश को बढ़ाने के उपाय निम्न है –

  • एक स्पष्ट, पारदर्शी एवं स्थिर कर व विनियामक वातावरण बनाना।
  • लघू एवं सूक्ष्म उद्योगों को समृद्ध करने के लिए अनुकूल वातावरण बनाना।
  • छोटे-बड़े दोनों उद्योगों पर निवेश परक नीतियों पर ध्यान देना।
  • व्यापार करने की लागत को घटाना जिससे लाभ में वृद्धि होगी परिणामस्वरूप बचत निवेश में रूपान्तरित।
  • बैंकिग व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है जो बचत के गतिशीलन को बढ़ाता हैं

3. राजकोषीय संघवाद और जवाबदेही में समन्वय : क्या इसमें निम्न संतुलन अवरोध है ?

परिचय

  • कराधान राज्य के राजस्व में वृद्धि का साधन मात्र ही नहीं है अपितु यह आर्थिक और राजनीतिक विकास के लिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
  • कराधान राज्य और नागरिकों के मध्य एक सामाजिक संविदा होती है।
  • राज्य का कर्त्तव्य है कि अनिवार्य सेवाएँ के वितरण के माध्यम से कम सम्पन्न व्यक्तियों को संरक्षण प्रदान करना।  www.shivagstudypoint.com
  • संविदा में नागरिकों की भूमिका राज्य को जवाबदेह बनाए रखना है।

प्रत्यक्ष कराधान और विकास : व्यापक (केन्द्र और राज्य) स्तर

  1. आर्थिक एवं राजनैतिक विकास कुल करों में प्रत्यक्ष करों के बढ़ते हुए हिस्से का अनुषंगी रहा है।
  2. विकसित देश उभरते बाजारों की अपेक्षा प्रत्यक्ष करों से ही अपने राजस्व का उच्च अनुपात संग्रहित करते है।
  3. भारत के प्रत्यक्ष कर का हिस्सा विकास के तुलनात्मक चरण में अन्य देशों के समान है, किन्तु भारत में कुल करों में प्रत्यक्ष करों का हिस्सा न्यूनतम है।

प्रत्यक्ष कराधान और विकास : उप संघीय स्तर

  1. भारतीय राज्यों और स्थानीय सरकारों द्वारा प्रत्यक्ष कर संग्रहण अन्य संघीय देशों में अपने समकक्षों की तुलना में काफी कम है।
  2. भारतीय के शहरी स्थानीय शासन अंतर्राष्ट्रीय मानको के काफी करीब है। भारत में अभी तक ग्रामीण स्थानीय शासन की तुलना में ULGS का राजकोषीय शक्ति के स्तरे में अधिक उभार हुआ है।

स्थानीय शासन : क्या है ?

  • 73 वें संविधान संशोधन 1992 द्वारा पंचायतों को स्वशासन की संस्था के रूप में मान्यता दी।  www.shivagstudypoint.com
  • 74 वें संविधान संशोधन 1993 शहरी स्थानीय शासन को भी वही दर्जा प्रदान किया गया है।
  • 20 लाख से ऊपर के आबादी वाले राज्यों में त्रिस्तरीय RLG अथवा पंचायतों की बात कही जैसे (जिला, माध्यमिक तथा ग्राम स्तर) राज्यों को ऐसे और प्राधिकार RLG को देना अनिवार्य बनाया गया। ताकि वे स्वशासन की संस्थाओं के रूप में कार्य कर सके।
  • 29 विषय – पंचायतों के तथा 18 विषय ULG के लिए निर्धारित।
  • Art. 243(1),(4) के तहत राज्यों से एक पंचवर्षीय योजना राज्य वित्त आयोग के गठन की बात।

सरकार के विभिन्न स्तरों के व्यय संबंधी पैटर्न

  • केन्द्र और राज्य सरकारें RLG की तुलना में प्रति व्यक्ति औसतन 15-20 गुणा से भी अधिक तथा लगभग तीन गुणा अधिक व्यय करती है।
  • 2010-11 से RLGS द्वारा प्रति व्यक्ति किये जाने वाले व्यय में लगभग चार गुणा की वृद्धि हुई है।

अंतरित निधियों पर अत्यधिक निर्भरता

  1. ULG भिन्न है – ULGS लगभग स्वयं के संसाधनों से कुल राजस्व का 44% भाग सृजित करते है। RLGS लगभग पूरी तरह (95%) अंतरण पर ही निर्भर हैं
  2. राज्यों में भिन्नता –
  • उन राज्यों का RLGS जो कुछ प्रत्यक्ष कर और स्वयं कर राजस्व संग्रहीत करते है। केरल, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक    www.shivagstudypoint.com
  • कुछ राज्यों का RLGS प्रायः पूर्ण रूप से अंतरणों पर निर्भर करते है। यूपी

प्रत्यक्ष करों पर अधिक ध्यान – केन्द्रित क्यों ?

  • अप्रत्यक्ष करों से, नागरिकों पर बोझ बढ़ जाता है किन्तु बोझ का यह भाव उस बात पर छोड़ दिया जाता है कि नागरिक स्वयं विकल्प का चयन कर रहे है।
  • आर्थिक विकास के प्रत्यक्ष करों का संग्रह अधिक होना चाहिए क्योंकि इससे आर्थिक विषमता में कमी आती है।
  • राज्य स्तर पर निर्धारित और संग्रहीत संपति कर भू-कर हैं
  • भवन कर जिससे नगरपालिका और ग्राम पंचायत स्तरों पर संगहीत किया जाता है।

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Que. 5. कराधान राज्य और नागरिकों के मध्य एक सामाजिक संविदा होती है। स्पष्ट कीजिए ?

Ans. कराधान राज्य और नागरिकों के मध्य एक सामाजिक संविदा होती है क्योंकि –

  • इससे राज्य के कर्त्तव्य का बोध होता है कि अनिवार्य सेवाएँ के वितरण के माध्यम से कम सम्पन्न व्यक्तियों को संरक्षण प्रदान करना है।
  • इससे नागरिकों की भूमिका भी स्पष्ट होती है कि राज्य को जवाबदेह बनाए रखना ताकि राज्य राजस्व को दुरूपयोग नहीं करे।  www.shivagstudypoint.com
  • कराधान नागरिकों पर भारित हाता है जिससे देश के विकास में भागीदार बनते है जबकि राज्य उपर्युक्त राजस्व का वितरण समतामूलक समाज के निर्माण के रूप में होता है।

             इसलिए प्रत्येक राज्य अप्रत्यक्ष एवं प्रत्यक्ष कराधान पर बल देता है वहीं जनता इसको चुकाकर संविदा के रूप में अनुबंध होता है जिससे एक तरफ राजकोषीय संघवाद का विकास होता है तो दूसरी तरफ जवाबदेही में समन्वय।

          वस्तुतः कराधान राज्य के राजस्व में वृद्धि का साधन मात्र ही नहीं है अपितु यह आर्थिक और राजनीतिक विकास के लिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

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Que. 6. आर्थिक विकास के लिए प्रत्यक्ष करों पर अधिक ध्यान केन्द्रित करना जरूरी है वहीं दूसरी ओर आर्थिक संतुष्टि के लिए एक विरोधाभाषी कदम प्रतीत होता है।

Ans. आर्थिक विकास का अर्थ है उत्पादन में वृद्धि के साथ गुणात्मक विकास होना (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक)

आर्थिक विकास के लिए प्रत्यक्ष करों पर अधिक ध्यान केन्द्रित करना जरूरी है क्योंकि –

  • प्रत्यक्ष करों में बढ़ोतरी से राजस्व का संग्रह अधिक होगा जो आर्थिक विकास की शर्त है क्योंकि इससे आर्थिक विषमता में कमी आती है।
  • प्रत्यक्ष करों में बढ़ोतरी का बोझ अधिक आय वाले नागरिकों पर पड़ता है जिससे राजरूव नागरिकों के कल्याण के लिए कल्याणकारी योजनाओं का संचालन करती है जिससे आर्थिक विकास होता है।

वहीं दूसरी ओर आर्थिक संवृद्धि के लिए यह एक विरोधाभाषी कदम प्रतीत होता है क्योंकि –

  1. प्रत्यक्ष करों में वृद्धि से निवेशकों को लाभ अधिक नहीं होता है जिससे बचत और निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  2. आर्थिक संवृद्धि के लिए निवेश एक प्राथमिक शर्त है जो वहीं पर ही होता है जहाँ पर प्रत्यक्ष करों की स्लैब कम हो ताकि लाभांश में वृद्धि हो।  www.shivagstudypoint.com
  3. प्रत्यक्ष कर में वृद्धि से लोगों की बचत में कमी आयेगी जिससे बाजार में मांग कम हो सकती है जबकि आर्थिक संवृद्धि के लिए मांग का बना रहना जरूरी है।

      वस्तुतः आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास के लिए प्रत्यक्ष करों को इस प्रकार सुनिश्चित किया जाए कि दोनों को मूर्तिकरण मिल सके।

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Que. 7. लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक स्थानीय शासन है, लेकिन भारत में अभी भी ग्रामीण स्थानीय शासन के समक्ष अनेक चुनौतियों है। परीक्षण कीजिए ?

Ans. लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक स्थानीय शासन है क्योंकि –

  1. लोकतंत्र के मजबूत होने की शर्त है कि उसमें सहभागिता कितनी है जो स्थानीय स्तर पर ज्यादा सुनिश्चित होती है।
  2. समस्याओं का समाधान अपने स्तर पर होने पर समस्या के मूल समाधान से सहभागिता बढ़ती है।
  3. लोकतंत्र के लिए प्राथमिक शर्त है कि सभी का विकास सुनिश्चित हो, इसके लिए आवश्यक है कि स्थानीय स्तर पर शासन की जनता से निकटता हो जिससे सर्वोंगीण विकास की अवधारणा मूर्त रूप लेती है। www.shivagstudypoint.com

लेकिन भारत में अभी भी ग्रामीण स्थानीय शासन के समक्ष अनेक चुनौतियाँ है जैसे –

  1. वित्तीय चुनौती
  2. कार्यकारी चुनौती
  3. सामाजिक चुनौती
  4. स्थानीय कर्मचारियों की चुनौती
  5. राजनैतिक दलों के हस्तक्षेप की चुनौती

        उपरोक्त चुनौतियों के कारण ग्रामीण स्थानीय शासन को लाया गया वह अपने उद्देश्यों में सफल पूर्ण रूप से नहीं हो पाई।

     लेकिन परीक्षण किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि सरकार स्थानीय शासन की वित्तीय एवं सामाजिक चुनौती को कम करने प्रयास किया जैसे – ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण, 14 वें वित्त, 12 वीं पंचवर्षीय योजना के तहत सीधे ग्रामीण स्थानीय शासन को वित्त का हस्तातंरण किया गया जिससे वित्तीय चुनौती कम हुई है।

4. क्या विकास में विलंबित अभिवृति एक बाधा बन जाती है ? क्या भारत उससे बच सकता है ?

सर्वे में अर्थव्यवस्था की चार श्रेणियाँ –

  1. निम्न आय – जिसकी प्रति व्यक्ति वास्तविक GDP क्रम शक्ति समानता के संदर्भ में अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय की तुलना में 5% से कम हो।
  2. निम्न मध्यम आय – 5-15 प्रतिशत।
  3. उच्च मध्यम आय – 15-35 प्रतिशत।
  4. उच्च आय – अमेरिका के आय से अधिक हो।

व्यापार का गुरूत्व मॉडल

  • इस मॉडल के अनुसार यदि अभिसरण होता है तो इससे व्यापार में वृद्धि होगी।
  • दो बराबर आकार वाले देश, उस परिदृश्य की तुलना में जहां एक बड़ा देश व्यापार के अधिकांश भाग के लिए जिम्मेदार है कि तुलना में अधिक व्यापार भागीदारी करेगें।

परिचय – आर्थिक अभिस्तति –

  • आर्थिक विकास की दौड़ में शामिल होना।  www.shivagstudypoint.com
  • जो निर्धन देशों द्वारा संपन्न देशों के समकक्ष आने तथा जीवन स्तर में व्याप्त अंतराल को कम करने की प्रक्रिया है।
  • 1980 के दशक के मध्य से निर्धन वर्ग के देशों के संपन्न वर्ग के देशों के समकक्ष आने की प्रक्रिया में तेजी आई।

स्वयं भारत का विकास क्रम उन्नयन अनुकूल वर्ष 1960 में भारत एक निम्न आय समूह में शामिल था। जिसकी प्रतिव्यक्ति आय 1033 $ थी। ( U.S.A. की तुलना 6% है।)

वर्ष 2008 में भारत निम्न आय समूह में तथा प्रतिव्यक्ति आय 6538 $ थी। USA की तुलना 12% है।

वैश्विक वित्तीय संकट के पश्चात विश्व भर में विकास दर में तेजी से गिरावट आई थी। यद्यपि निम्न आय वर्ग के देशों में विकसित देशों की तुलना में गिरावट की दर कम थी। फिर भी भारत संशय में है जिसके निम्न कारण है –

तीव्र वैश्वीकरण का परित्याग इसके कारण नए विलंबित अभिसरण के देशों के लिए समान व्यापारिक अवसर उपलब्ध नहीं हो सकते। www.shivagstudypoint.com

तीव्र वैश्वीकरण का परिणाम विकसित देशों में विभक्त रहा है जिसके कारण घरेलू उद्योगों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है परिणामस्वरूप अपने हितों की रक्षा हेतू संरक्षणवाद का सहारा, ट्रेड वाद के रूप में सामने आया है।

बाधित संरचनात्मक परिवर्तन : बेहतर और विकास – 

  • परिवर्तनों की सफलता के लिए विनिर्माण क्षत्र को निर्याणक माना जाता है क्योंकि इसमें रोजगारों का सृजन ज्यादा होता है परिणामस्वरूप आय में वृद्धि से सदैव बाजार में मांग बनी रहती है।
  • संसाधनों को निम्न उत्पादकता वाले क्षेत्रों से 15  उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्रों में स्थानांतरित करना।
  • समय के साथ संवृद्धि और बेहतर संवृद्धि के मध्य सकारात्मक सहसंबंध कमजोर हुआ है।
  • समय से पूर्व विऔद्योगीकरण।

मानव पूँजी का हा्रस

  1. कुछ देश संरचनात्मक रूपान्तरण के लिए आवश्यक बुनियादी प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने में भी विफल रहे।
  2. निम्न आय वर्ग वाले देशों और विकसित अर्थव्यवस्थाओं के मध्य एक व्यापक शैक्षणिक उपलब्धि अंतराल है। www.shivagstudypoint.com

जलवायु परिवर्तन के कारण निर्मित कृषि दबाव

  1. प्रत्येक समयावधि में विकसित देशों की कृषि संवृद्धि दर विकासशील देशों की तुलना में लगातार उच्ची रही है। वहीं निर्धनतम देशों के लिए इस संवृद्धि दर में GFC के पश्चात् ओर अधिक गिरावट आई।
  2. इसका मुख्य कारण तापमान में परिवर्तन का प्रभाव है। भारतीय कृषि तापमान में वृद्धि के प्रति सुभेद्य और वर्षा पर इसकी निर्भरता बहुत अधिक है।

उपाय

मानव पूँजी में तेजी से सुधार किया जाए – 

  • बेहतर स्वास्थ्य
  • शिक्षा
  • महिला सशक्त
  • शिक्षा में नवाचार
  • कौशल विकास

जलवायु परिवर्तन और जल अभाव जैसी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद कृषि उत्पादकता में तेजी से सुधार किया जाए –

  • बुँद-बुँद सिंचाई
  • जलवायु सुभेद्य बीजों का सृजन
  • जलवायु प्रदेश के अनुरूप कृषि कार्य।  www.shivagstudypoint.com

आंतरिक बाजारों का सृजन करके।

सीखने की कमी की कुल गणना – उन बच्चों की संख्यां को मापता है जो बुनियादी शिक्षा के बैचमार्क को पूरा नहीं करते है।

सीखने की कमी के अन्तर – इसके अंतर्गत भी सम्मिलित किया जाता है कि प्रत्येक घर बेंचमार्क से कितना दूर है।

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Que. 8. तीव्र वैश्वीकरण का परित्याग विकसित देशों की अपेक्षा निम्न आय वर्ग के लिए ज्यादा खतरनाक है। इस संदर्भ में भारत के संशय के कारणों की चर्चा करें ?

Ans. वैश्वीकरण का अर्थ है सभी अर्थव्यवस्था का एक हो जाना।

तीव्र वैश्वीकरण का परित्याग विकसित देशों की अपेक्षा निम्न आय वर्ग के लिए ज्यादा खतरनाक है क्योंकि –

  • निम्न आय वर्ग के देशों को समान व्यापारिक अवसर उपलब्ध नहीं हो सकेगें।
  • विकसित देशों ने तो वैश्वीकरण के अवसरों का लाभ तो अभिसरण से पहले ही ठाण लिया था। वे अब घरेलू उद्योगों को संरक्षण प्रदान करने के लिए संरक्षणवाद की नीति को अपना रहे है।  www.shivagstudypoint.com
  • निम्न आय वर्ग के देशों में संवृद्धि पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा क्योंकि इससे विऔद्योगीकरण को बल मिलेगा।

           हालाँकि भारत जैसे कुछ देशों के लिए विश्व व्यापार की प्रवृत्तियों में इस प्रकार की परिवर्तनों के कारण संवृद्धि पर इस प्रकार की बाह्य बाधाएँ नहीं हो सकती है क्योंकि भारत स्वयं बहुत बड़ा बाजार सृजक है। फिर भी संशय है जिसके निम्न कारण है –

  1. मानव पूँजी का हा्रस होना।
  2. जलवायु परिवर्तन के कारण निर्मित कृषि दबाव।
  3. बाधित संरचनात्मक परिवर्तन।
  4. संरक्षणवाद।

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Que. 9. वैश्विक वित्तीय संकट के बाद विकास की दर में गिरावट दर्ज की गयी लेकिन भारत पर इसका प्रभाव नगण्य रहा है। उपर्युक्त कारणों की पहचान कीजिए।

Ans. वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद वैश्विक विकास दर में गिरावट दर्ज की गयी है क्योंकि –

  • इसके बाद सम्पूर्ण विश्व में तीव्र गति से वैश्वीकरण का परित्याग शुरू हो गया।
  • यह दौर जलवायु परिवर्तन का था जिसके कारण कृषि क्षेत्र पर ज्यादा दबाव पड़ने लगा था।
  • विकसित देशों के समक्ष व्यापार का गुरूत्व मॉडल उपस्थित होना अर्थात् छोटे देश भी तीव्र गति से अभिसरण कर रहे थे।  www.shivagstudypoint.com

लेकिन भारत पर इसका प्रभाव नगण्य रहा है क्योंकि –

  • भारत की अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था नहीं है जिसके कारण मंदी का प्रभाव इतना प्रतिदक्षित नहीं हुआ है।
  • भारत स्वयं एक बहुत बड़ा बाजार है जिसके कारण मांग पर इतना प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा परिणाम स्वरूप मंदी की स्थिति नहीं आ पाई।
  • वैश्विक दृष्टिकोण के विपरीत भारत में सभी क्षेत्रों के समक्ष समग्र दृष्टिकोण को अपनाया है जिससे हर क्षेत्र में मांग बनी रही है।

          वस्तुतः अर्थव्यवस्था के स्थायित्व की बात की जाए तो यह कहना ज्यादा तर्कसंगत लगता है कि घरेलू मांग को बनाये रखने के साथ मंदी के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण रखा जाना चाहिए। www.shivagstudypoint.com

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Que. 10. प्राकृतिक संसाधनों की अपेक्षा मानव पूँजी का अधिक महत्व होता है। जापान जैसे देश की वस्तुस्थिति इसे साबित करती हुई प्रतीत होती है। भारत के संबंध में आप अपने तर्को की पुष्टि कीजिए।

Ans. संसाधन का सामान्य सा अर्थ है व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति करने में सक्षम तथा नया सृजनात्मक एवं रचनात्मक विकास किया जा सके।

        वैसे तो देखा जाये तो प्राकृतिक संसाधन एवं मानव संसाधन दोनों एक – दूसरे के पूरक है क्योंकि मानव संसाधन नहीं होगा तो प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग नहीं, वहीं मानव के कल्याण व विकास के लिये प्राकृतिक संसाधन जरूरी है। www.shivagstudypoint.com

वस्तुतः प्राकृतिक संसाधनों की अपेक्षा मानव पूँजी का अधिक महत्व है क्योंकि –

  • प्राकृतिक संसाधनों के अभाव में भी मानव संसाधनों का सृजन कर सकता है। जैसे – जापान में।
  • प्राकृतिक संसाधन अपने आप में परिपूर्ण नहीं है इसके लिए मानव संसाधन की आवश्यकता है जो प्राकृतिक संसाधनों को विकास का आधार बना सकता है।
  • मानव संसाधन भी प्राकृतिक संसाधनों के अभाव में विकास कर सकता है क्योंकि नवाचार तथा संर्वेद्धन पर बल देता है। जैसे – जापान, सिंगापुर। www.shivagstudypoint.com

इस संदर्भ में भारत की वस्तुस्थिति के सम्बंध में यह कहा जा सकता है कि –

  1. यहाँ प्राकृतिक संसाधन भी भरपूर मात्रा में है।
  2. भारत अभी जनांकिकीय आधिक्य की स्थिति में है अतः इसको मानव संसाधन बनाने के लिए कौशल प्रदान की जरूरत है।

वस्तुतः भारत में संवृद्धि व विकास के लिए पूरकता की भूमिका निभाते है।

5. जलवायु : जलवायु परिवर्तन और कृषि

उद्देश्य

  • तापमान, और वर्षा के जलवायवीय पैटर्न में परिवर्तनों का प्रलेखन करना।
  • जलवायु में होने वाले परिवर्तनों के फलस्वरूप कृषि उत्पादकता पर पड़ने वाले प्रभाव का मूल्यांकन करना। www.shivagstudypoint.com
  • जलवायु परिवर्तन के साथ संयोजन के लिए इन अल्पावधिक आंकलनों का उपयोग करना ताकि भारतीय कृषि पर वैश्विक तापमान के प्रभाव का मूल्यांकन किया जा सके।

कृषि की उत्पादकता पर मौसम का प्रभाव :-

  1. मौसम में अल्प परिवर्तन का उत्पादकता पर अत्यंत कम या कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता है।
  2. चरम मौसमी घटनाओं के, सिंचित और असिंचित क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभाव एक – दूसरे से अत्यंत भिन्न होते है।

            वर्षा सिंचित क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसलें, विशेष रूप से खरीफ और रबी दोनों ही में उगाई जाने वाली दालें, मौसमी आघातों के प्रति सुभेद्य होती है, जबकि धान और गेहूँ अपेक्षाकृत अधिक प्रतिरक्षित होते है।

कृषि आय पर प्रभाव

  1. इस प्रभाव का आकलन उत्पादन के मूल्य से किया जाता है।
  2. असिंचित क्षेत्रों में मौसम के आघात के सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव को दर्शाते है।
  3. हालाँकि निम्नतर आपूर्ति से स्थानीय कीमतों में वृद्धि होनी चाहिए परन्तु आंकड़ों के अनुसार इस मामले में आपूर्ति आघात मुख्य कारक होता है जहाँ उपज में कमी के फलस्वरूप आय में कमी होती है।

कृषि में व्याप्त अस्थिरता के कारण

  • भारत में कृषि, मौसम की अनिश्चिताओं के कारण अधिक सुभेद्य है क्योंकि अभी भी लगभग 52% कृषि क्षेत्र असिंचित और वर्षा पर निर्भर
  • तापमान में वृद्धि का प्रभाव। www.shivagstudypoint.com
  • मौसम – वर्षा की कमी।

दीर्घकालीन कृषि निष्पादन

  1. 1960 के पश्चात् से भारत में वास्तविक कृषि विकास औसत रूप से लगभग 2.8% रहा है।
  2. यद्यपि समय के साथ भारत की कृषि संवृद्धि की अस्थिरता में भारी गिरावट हुई है।

कृषि पर ध्यान देने की आवश्यकता

आर्थिक कारण :-

  • GDP – 16 प्रतिशत।
  • रोजगार – 49 प्रतिशत।
  • कृषि का खराब प्रदर्शन – मुद्रास्फीति कृषकों में तनाव राजनीतिक एवं सामाजिक असंतोष का कारण
  • कृषि की उत्पादकता में वृद्धि से अर्थव्यवस्था के अपेक्षाकृत अधिक उत्पादक क्षेत्रों की ओर स्थानांतरण सरल हो जाएगा।

गैर आर्थिक कारण :-

  1. संकीर्णता
  2. साम्प्रदायिकता
  3. अज्ञानता
  4. स्थानीयता का गर्त

जलवायवीय पैटर्न, तापमान और वर्षा के सामयिक और स्थानिक पैटर्न का प्रलेखन –

  • 1970 से हाल के दशक में तापमान वृद्धि
    खरीफरबी 
  0.45 डिग्री0.63 डिग्री
  • 1970 से हाल के दशक में वर्षा में गिरावट औसत 86 mm
   खरीफ  रबी
  26 mm  33 mm
  • उच्च तापमान वाले दिनों की संख्या में वृद्धि।
  • कम तापमान वाले दिनों की संख्या में समान रूप से गिरावट।

प्रमुख निष्कर्ष :-

  • किसी वर्ष में जब तापमान 1 डिग्रीC अधिक होता है तो असिंचित जिलों में किसानों की आय में खरीफ 6.2 प्रतिशत  और रबी 6 प्रतिशत की गिरावट हुई।
  • किसी वर्ष में जब वर्षा का स्थिर औसत से 100mm कम होता है तो खरीफ की आय 15 प्रतिशत तथा रबी की आय 7 प्रतिशत की गिरावट हुई। www.shivagstudypoint.com

उपाय :-

  1. सिंचाई के विस्तार के लिए ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर, जल प्रबंधन प्रौद्योगिकी को प्राथमिकता।
  2. विद्यूत सब्सिडी को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण द्वारा प्रतिस्थापित करने की आवश्यकता है ताकि विद्यूत के प्रयोग की पूर्ण रूप से लागत प्रदान की जा सके और जल संरक्षण को भी बढ़ाया जा सके।
  3. कृषि क्षेत्र में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  4. वर्तमान फसल बीमा योजना कार्यक्रम में मौसम आधारित मॉडल एवं प्रौद्योगिकी का उपयोग किए जाने की आवश्यकता है।

जलवायु परिवर्तन :-

1. अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास –

  • TPCC –  अतः सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल
  • 1988 – स्थापना
  • ओजोन छिद्र का पता चलना
  • UNFCC – पृथ्वी सम्मेलन

2. राष्ट्रीय प्रयास –

  • काहाहहमयाय नेशनल एक्शन प्लान ऑफ क्लाइमेंट चेंज

8 घटक –

  1. सतत विकास कृषि पर राष्ट्रीय मिशन (जलवायु परिवर्तन कृषि, उर्वरक,  पानी,  मृदा क्षरण, बीज) 
  2. क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर
  3. सिंचाई- ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर।
  4. मृदा स्वास्थ्य कार्ड।
  5. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना।
  6. सुखा ग्रस्त क्षेत्र विकास कार्यक्रम।
  7. नेशनल प्लान टू काम्बेवट डर्जट्रिफिकेशन
  8. नेशनल वाटर शेड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट।

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Que. 11. जलवायु परिवर्तन से आप क्या समझते है ? इस दौर में सरकार को कृषि पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में आप कृषि क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के अनुरूप क्या सुझाव देना पंसद करेगें ?

Ans. किसी क्षेत्र विशेष में औसत वायुमंडलीय दशाओं के (तापमान, वर्षा, आर्द्रता) दीर्घकालिक परिवर्तन ही जलवायु परिवर्तन कहलाता है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में सरकार को कृषि पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि –

  • सतत् विकास लक्ष्य, भूखमरी को समाप्त करना, खाद्य सुरक्षा, को प्राप्त करने के लिए।
  • जीडीपी में 16 प्रतिशत योगदान होने के बाद भी लगभग 50 प्रतिशत जनसंख्या की निर्भरता रखता है। www.shivagstudypoint.com
  • जल संरक्षण एवं मृदा की उर्वरता को बनाये रखने के लिए।
  • यदि कृषि क्षेत्र में विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है तो मुद्रास्फीति, राजनीतिक एवं सामाजिक असंतोष का कारण बन सकता है।
  • गैर आर्थिक कारकों में संकीर्णता, अज्ञानता एवं साम्प्रदायिकता को समाप्त करने के लिए भी (सर्वे अनुसार)

वस्तुतः जलवायु परिवर्तन जैसी सुभेद्य स्थिति में कृषि को सतत् बनाये रखने के लिए निम्न उपाय किए जा सकते है जैसे –

  1. सिंचाई क्षेत्र में सुधार कर प्रति बुंद अधिक उत्पादन बल दिया जाए। जिसके लिए ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर का उपयोग बढ़ाया जाए।
  2. कृषि क्षेत्र में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रयोग को बढ़ाकर न केवल उत्पादन बढ़ाया जा सकता बल्कि जलवायु परिवर्तन के अनुरूप कृषि भी की जा सकती है जैसे कम वर्षा वाले बीजो का उत्पादन।
  3. विद्यूत सब्सिडी को तार्किक बनाया जाए जिससे मृदा की उर्वरता भी बचेगी तो दूसरी तरफ जल संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा। www.shivagstudypoint.com

       वस्तुतः जलवायु परिवर्तन के अनुकूल कृषि ही खाद्द्य सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ सतत् विकास लक्ष्य को रक्षणीय बना सकती है।

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Que. 12. वैश्विक जलवायु परिवर्तन से भारतीय कृषि क्षेत्र पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। जिससे सतत् विकास के लक्ष्यों में बाधा उत्पन्न हो सकती है। इस संदर्भ में सरकार के द्वारा किन – किन उपायों पर बल दिया जा रहा है ? चर्चा कीजिए।

Ans. वैश्विक जलवायु परिवर्तन से भारतीय कृषि क्षेत्र पर निम्नलिखित नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है जैसे –

  1. इसके सुखा जैसी कृषि समस्या की बारम्बारता एवं तीव्रता बढ़ जाती है जिससे कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव।
  2. वर्षा के अत्यधिक होने के कारण मृदा का अपरदन हो जाता है परिणामस्वरूप भूमि बंजर होने लगती है।
  3. तापमान वृद्धि के कारण फसलों की गुणवता में कमी आती है क्योंकि इसके कारण पोषक तत्वों का विनाश हो जाता है। www.shivagstudypoint.com
  4. समुद्री जल स्तर के ऊपर बढ़ने के कारण तटीय क्षेत्र जलमग्न हो जाते है परिणामस्वरूप कृषि क्षेत्र में कमी के साथ लवणता में वृद्धि हो जाती है।

उपर्युक्त प्रभावों के कारण सतत् विकास के लक्ष्यों में बाधा उत्पन्न होती है जैसे –

  • इसके कारण फसलों की गुणवता कम होने के कारण बाह्य भूख तो मिट सकती है किन्तु आंतरिक भूख नहीं। अर्थात् भूखमरी समाप्त नहीं होगी।
  • उत्पादन कम होने के कारण खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना असंभव है।
  • इससे गरीबी और बेरोजगारी में वृद्धि होगी।

इसी कारण सरकार सतत् विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने तथा जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने के लिए निम्न प्रयास कर रही है जैसे –

  1. राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन।
  2. राष्ट्रीय जल मिशन।
  3. जलवायु स्मार्ट कृषि।
  4. प्रति बुंद अधिक उत्पादन।
  5. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का कृषि क्षेत्र में प्रयोग।

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Que. 13. क्लाइमेंट स्मार्ट एग्रीकल्चर क्या है ? क्या सीएसए कृषि में जलवायु परिवर्तन की सुभेद्यता को कम कर सकता है ? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

Ans. जलवायु स्मार्ट कृषि एक ऐसी संकल्पना है जो जलवायु परिवर्तन के अनुरूप कृषि की समस्या के हल करने की बात करता है। इसके तीन उद्देश्य है –

  1. कृषि उत्पादकता को बढ़ाना।
  2. जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना।
  3. वैश्विक तापन गैसों का कम उत्सर्जन करके पर्यावरण संरक्षण।

सीएसए कृषि में जलवायु परिवर्तन की सुभेद्यता को कम कर सकता है क्योंकि –

  1. इसके अंतर्गत जलवायु क्षेत्रों के अनुसार कृषि कार्य करने पर बल दिया जाता है। जैसे – कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कम वर्षा की फसलों की कृषि। www.shivagstudypoint.com
  2. इस कृषि में कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रति बुंद अधिक उत्पादन तकनीक का सहारा लिया जाता है जिससे ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर को अपनाया जाता है।
  3. इस कृषि में वैश्विक तापमान बढ़ाने वाली गैसों के कम उत्सर्जन को ध्यान में रखा जाता है जिसके लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड को अपनाकर कृषि क्षेत्र की लागत घटाने के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बल दिया है।
  4. इसमें जलवायु अनुकूलन कृषि प्रौद्योगिकी का सहारा लिया जाता है।

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Que. 14. गांवों को स्थानीयता का गर्त, संकीर्णता और साम्प्रदायिकता एवं अज्ञानता का अड्डा कहा जाता है। इस कथन के संदर्भ में कृषि किस प्रकार से उपर्युक्त समस्याओं का समाधान करके स्मार्ट गांवों में परिवर्तित कर सकती है ?

Ans. डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने गांवों को स्थानीयता का गर्त, संकीर्णता और साम्प्रदायिकता एवं अज्ञानता का अड्डा कहा है क्योंकि –

  • गांवों के लोगों के पास अपने जीवन सुधारने के लिए पर्याप्त मात्रा में पैसा नहीं होता है जिसके कारण यह नवीन विचारों नवाचार के प्रति संकीर्णता का सहारा लेते है।
  • गांवों के लोगों का विकास नहीं होने के कारण क्षेत्रवाद से परिपूर्ण हो जाते है।
  • अज्ञानता के फलस्वरूप तथा संसाधनों पर आधिपत्य के लिए धर्म के आधार का सहारा लिया जाता है जिससे साम्प्रदायिकता जन्म लेती है।

       वस्तुतः ग्रामीण क्षेत्रों की उपर्युक्त समस्याओं के समाधान के लिए आर्थिक समीक्षा में कृषि पर ध्यान देने की आवश्यकता को महसूस किया है। प्रश्न उठता है कृषि किस प्रकार इस समस्या का स्मार्ट कर देगी ? इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि –

  1. यदि कृषि क्षेत्र का समुचित विकास किया जाए तो कृषि उत्पादन में वृद्धि होगी परिणामस्वरूप सभी की खाद्य सुरक्षा के सुनिश्चित होने के साथ गरीबी, भूखमरी में कमी आयेगी जो साम्प्रदायिकता को कम करेगी। www.shivagstudypoint.com
  2. कृषि का विकास होने के कारण इनका दूसरे क्षेत्रों के साथ परस्पर संपर्क में वृद्धि होगी, साथ ही जीवन स्तर उच्च होने के कारण स्थानीयता की संकीर्ण भावना समाप्त होगी।
  3. कृषि उत्पादन में वृद्धि होने के कारण ये नये विचारों को अपनाना शुरू करेगें जिससे संकीर्णता समाप्त होगी।

           इसलिए कहा जाने लगा कि इससे स्मार्ट गांवों का विकास होगा इसके लिए कृषि के साथ ही समावेशी विकास पर बल देना होगा।

6. “कन्या नहीं पुत्र चाहिए।” क्या विकास ही इस समस्या का समाधान है ?

  • विकास काल – तुलनात्मक अध्ययन करना।
  • आनुक्रमिक काल  समय के हिसाब से चर्चा करना।
  • वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम – वैश्विक लिंग अंतर सूचकांक
  • चार स्तम्भ – आर्थिक भागीदारी
  • साक्षरता का अनुपात
  • राजनीतिक सशक्तिकरण
  • स्वास्थ्य एवं जीवन प्रत्याशा www.shivagstudypoint.com
  • रैंक – भारत का 2016 में 88 वाँ स्थान तथा 2017 में 108 वाँ स्थान है।
  • कारण – आर्थिक भागीदारी में कमी आयी (पहले – 38 प्रतिशत, वर्तमान – 26 प्रतिशत)
  • सार्क देशों की स्थिति – 1. भूटान 2. भारत
  • संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम – लिंग असमानता सूचकांक – स्तम्भ – प्रजनन स्वास्थ्य, सशक्तीकरण, कार्यबल में भागीदारिता
  • लिंग असमानता सूचकांक – भारत का 125 वाँ स्थान है।

सर्वे – (महिला सशक्तीकरण) 17 संकेतक

  1. निर्णय प्रबंधन अपने स्वास्थ्य के प्रति।
  2. घर खरीदने में निर्णय।
  3. परिवार और सम्बंधियों में सक्रियता।
  4. कमाने में निर्णय।
  5. गर्भनिरोधक में निर्णय।
  6. ज्यादा लड़के या लड़की होनी चाहिए इसमें निर्णय।
  7. घरेलू हिंसा के प्रति निर्णय।
  8. प्रतिवृत्ति गर्भनिरोधक।
  9. रोजगार।
  10. कमाने में महिला की भागीदारी पुरूषों के समान या ज्यादा।
  11. शिक्षा।
  12. शारीरिक और भावनात्मक हिंसा।
  13. पहले बच्चे के जन्म के समय आयु।
  14. विवाह के समय आयु।
  15. अंतिम संतान के जन्म पर लिंग अनुपात।
  16. महिला रोजगार।
  17. लड़के या लड़की।

परिणाम – भारत में इन संकेतकों में गिरावट

  • गर्भनिरोधक का उपयोग।
  • प्रतिवृत्ति गर्भनिरोधक।
  • रोजगार।
  • अंतिम संतान के जन्म पर लिंग अनुपात।
  • पैसा कमाने में भागीदारी।
  • Sun चाह – लिंग चयनात्मक – गर्भपात – जन्म ही नहीं ले पाई (मिसिंग गर्ल चाइल्ड) की समस्या। (63 मिलियन) www.shivagstudypoint.com
  • मेटा चाह – अनचाही गर्ल चाइल्ड की समस्या है। (20 मिलियन से अधिक)
  • 1992-93 – राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण रिपोर्ट -4
  • 1998-99 – स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के द्वारा।
  • 2005-06 – डायबिटीज और हाइपर टेंशन से सम्बधित आंकड़ा पहली बार शामिल। जिला स्तर पर आंकड़े तैयार किए गए (पहली बार)

सरकार के प्रयास

  1. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।
  2. सुकन्या समृद्धि योजना।
  3. मातृत्व अवकाश (26 सप्ताह)।

TFR (कुल प्रजनन समता) = 2.2

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Que. 15. भारत में लैगिक समानता के लिए कई संकेतकों पर काम किया गया किन्तु रोजगार और अपरिवर्तनीय गर्भनिरोध के प्रयोग और पुत्र की चाह के सम्बंध में, भारत को अभी कुछ दूरी तय करनी है। स्पष्ट कीजिए।

Ans. भारत में लैंगिक समानता के लिए आर्थिक समीक्षा में 17 संकेतकों, यथा – घरेलू हिंसा, गर्भनिरोधक उपाय, घर खरीदने में निर्णय, निर्णय प्रबंधन स्वास्थ्य के प्रति, शिक्षा, की समीक्षा की गई जिसमें से 13 संकेतकों में सराहनीय सुधार हुआ है। जिसका ही प्रतिकूल है कि महिलाओं की स्थिति में सुधार हो रहा है।

किन्तु रोजगार और अपरिवर्तनयी गर्भनिरोध के प्रयोग और पुत्र की चाह के सम्बंध में भारत को अभी कुछ दूरी तय करनी है क्योंकि –

वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक में कार्यबल में महिला श्रम की कमी होने की बात सामने आई है। जिसके पीछे निम्न कारण हो सकते है –

  • कृषि का आधुनिकीकरण व तकनीकीकरण।
  • पुरूषों की आय में अत्यधिक वृद्धि।
  • महिला सुरक्षा से संबंधित मुद्दा। www.shivagstudypoint.com

भारत में गर्भनिरोध के प्रयोग बहुत कम किए जाते है जो महिला के सशक्त न होने का संकेत है क्योंकि –

  • प्रजनन पर पुरूषों का नियंत्रण।
  • महिलाओं का आर्थिक रूप से सक्षम न होना।
  • पुत्र की चाह भी लैंगिक असमानता का सूचक है क्योंकि इसमें जब तक अंतिम संतान के रूप में पुत्र की प्राप्ति न हो जाए तब प्रतिवर्ती गर्भनिरोध का प्रयोग नहीं किया जाता है। इसके पीछे समाज की मानसिकता कार्य करती है।

इसलिए सरकार ने अनेक योजनाओं का संचालन किया है जैसे –

  1. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।
  2. सुकन्या समृद्धि योजना।
  3. मातृत्व अवकाश।

वस्तुतः इस दिशा में सुधार के लिए सरकार के साथ-साथ समाज को भी इसके लिए कार्य करना होगा।

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Que. 16. हाल ही में विश्व मुद्रा कोष ने बताया है कि भारत में महिलाओं की भागीदारी पुरूषों के समान हो जाए तो देश की अर्थव्यवस्था में सुधार हो सकता है। लैंगिक समानता के लिए सरकार के द्वारा किए जा रहे प्रयासों की समीक्षा कीजिए।

Ans. हाल ही में विश्व मुद्रा कोष की प्रमुख ने संकेत दिया कि भारत में महिलाओं की भागीदारी पुरूषों के समान हो जाए तो देश की अर्थव्यवस्था में 27 प्रतिशत तक सुधार हो सकता है। www.shivagstudypoint.com

प्रश्न यह उठता है कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ने के क्या फायदे है ? जैसे –

  • महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।
  • गरीबी में कमी आयेगी क्योंकि महिला निर्भरता में कमी आयेगी।
  • समानता मुर्त रूप लेगी।
  • शिक्षा में निवेश बढ़ेगा। रिपोर्ट के अनुसार कामकाजी महिला सर्वाधिक बच्चों की शिक्षा पर निवेश करती है।
  • स्वास्थ्य स्थिति में सुधार तथा जीवन प्रत्याशा में वृद्धि।

इसलिए सरकार अर्थव्यवस्था पर बोझ को कम करने तथा आर्थिक संवृद्धि को दहाई में लाने के लिए निम्न प्रयास कर रही है जैसे –

  1. सरकार द्वारा मुद्रा योजना, स्टैण्ड अप इंडिया कार्यक्रम से सस्ते दर पर महिला उद्यमियों को ऋण उपलब्ध करवाना।
  2. कंपनी एक्ट 2013 में 10 से अधिक श्रमिकों वाले क्षेत्र में महिला सुरक्षा से सम्बधित शिकायत निवारण तंत्र की स्थापना।

सरकार के प्रयासों के बावजूद कार्यबल में महिलाओं की कमी आई है। इस प्रकार देखा जाए तो इस कमी के पीछे निम्न कारण है –

  • कृषि का आधुनिकीकरण होने के कारण।
  • कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा का प्रश्न।
  • पुरूषों के वेतन में अत्यधिक वृद्धि। www.shivagstudypoint.com

       इस प्रकार सरकार के कदमों की समीक्षा की जाए तो यह कहना तर्कसंगत है कि सरकार के प्रयासों से महिलाओं की सहभागिता में वृद्धि हो रही किन्तु महिला सुरक्षा के साथ महिलाओं को इन क्षेत्रों में दक्ष बनाने की भी आवश्यकता है।

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Que. 17. विकास काल और आनुक्रमिक काल का लैंगिक समस्या के सम्बंध में अंतर को स्पष्ट करें। वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के लैंगिक सूचकांकों में भारत की स्थिति में गिरावट दर्ज की गई। इसके पीछे निहित कारणों की चर्चा कीजिए।

Ans. आर्थिक सर्वेक्षण में महिलाओं से सम्बंधित विषय में विकास काल और आनुक्रमिक काल का विवेचन किया है जिसमें निम्न अंतर है जैसे –

               विकास काल          आनुक्रमिक काल
इसमें देशों के साथ तुलनात्मक अध्ययन पर बल दिया जाता है।समय के अनुसार अध्ययन पर बल।
उदाहरण स्वरूप वर्तमान में भारत मध्यम आय है तो पूर्व में जिन देशों में मध्यम आय थी उस समय महिलाओं की क्या स्थिति थी।इसमें प्रतिवर्ष का उस देश की स्थिति में सुधार या गिरावट को देखा जाता है।

         हाल ही में वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम ने वैश्विक लिंग अंतर सूचकांक को जारी किया है जिसमें भारत की वर्ष 2017 में 108 वीं रैंक है जो पिछले वर्ष की अपेक्षा 20 अंकों की (88 वीं) गिरावट है।

      वहीं संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की लैंगिक असमानता सूचकांक में भारत 125 वें स्थान पर है। इसलिए आर्थिक सर्वे में लैंगिक समानता के दिशा में दिए गए सुधारों की समीक्षा की है। www.shivagstudypoint.com

उपरोक्त सूचकांक में भारत की स्थिति में गिरावट के पीछे निम्न तर्क दिए गए –

  • कार्यबल में महिला सहभागिता में कमी आई। इस रिपोर्ट में बताया गया कि अर्थव्यवस्था में महिला सहभागिता पहले (38 प्रतिशत लगभग) की अपेक्षा गिर रही है (26 प्रतिशत लगभग)
  • गर्भनिरोधक में महिला के निर्णय को महत्च नहीं दिया जाता है।
  • प्रतिवृत्ति गर्भनिरोधक में महिला की सहभागिता नहीं के बराबर है।

इसलिए इस स्थिति में सुधार के लिए निम्न कार्य कर रही है –

  • मातृत्व अवकाश में वृद्धि की गई।
  • कंपनी एक्ट 2013 के तहत महिला सुरक्षा वंत्र की स्थापना।
  • फ्रेच की स्थापना।
  • बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।

वस्तुतः इन प्रयासों के साथ समाज को भी अपनी महती भूमिका निभानी पड़ेगी।

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Que. 18. “पुत्र चाह” ने मिसिंग गर्ल चाइल्ड की समस्या को जन्म दिया तो वहीं मेटा वरीयता ने लिंगानुपात को बढ़ाया है इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

Ans. आर्थिक सर्वेक्षण में महिलाओं के सशक्तीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया है इसी का ही प्रतिफल है कि महिलाओं से सम्बंधित विषयों की चर्चा की गई।

पुत्र चाह लिंग चयनित गर्भपात को जन्म देती है क्योंकि –

  • समाज पुत्र प्राप्ति के लिए अवैध तरीकों से लिंग का चयन करते है।
  • इसमें पुत्रों को महत्व दिया जाता है जिसके कारण पुत्रियाँ जन्म ही नहीं ले पाती।

              इस कारण लिंग का चयन करके गर्भपात करा दिया जाता है। जिसके कारण मिसिंग गर्ल चाइल्ड की समस्या उत्पन्न हुई है। अर्थात् पुत्रियों के जन्म लेने से पहले ही गर्भपात करा दिया गया। भारत में अभी 63 मिलियन मिसिंग गर्ल चाइल्ड है। इसके कारण देश का लिंगानुपात लगातार गिर रहा है जो शुभ संकेत नहीं है।

         वहीं दूसरी ओर मेटा वरीयता अर्थात् पहले के बाद दूसरी संतान, ने लिंगानुपात को बढ़ाया है क्योंकि इसके कारण तब तक प्रजनन विराम नियमों को नहीं अपनाया जाता है जब तक पुत्र की प्राप्ति न हो जाए क्योंकि इससे बच्चियों का जन्म तो होता है क्योंकि गर्भपात करवाना अवैध है। परिणामस्वरूप लिंगानुपात में सुधार होता है।

              प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में लिंगानुपात में स्थिति सुधरने लैंगिक समानता को मूर्त रूप मिला ? इसका उत्तर नहीं में है क्योंकि मेटा वरीयता में अनचाही गर्ल चाइल्ड की समस्या है। हाँ इताना जरूर है कि लिंगानुपात सुधरा है परन्तु इनके साथ समान व्यवहार नहीं किया जाता है जिससे लैंगिक समानता स्थापित नहीं हो पाई। जो वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की विश्व लिंग अंतर रिपोर्ट स्थिति बयां कर रही है।

             वस्तुतः परीक्षण किया जाए तो यह कहना ज्यादा तर्कसंगत होगा कि पुत्र वरीयता और मेटा वरीयता का समाधान विकास के पथ पर अग्रसर होने से नहीं होगा बल्कि इसमें सरकार के साथ-साथ समाज की सोच को बदलकर समाज की सक्रिय भागीदारी की जरूरत है। www.shivagstudypoint.com

7. भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का रूपांतरण

  • शून्य का पहला प्रयोग – बख्शाली पांडुलिपी (संस्कृत) -खबर पखतुनवाड़ा क्षेत्र (पाकिस्तान)

विज्ञान और प्रौद्योगिकी

सामाजिक परिवर्तनआधुनिक अर्थव्यवस्थासाम्प्रदायिकता
 सभ्य समाजमानव सुरक्षावैज्ञानिक मनोवृत्ति के रूप में विकसित कर नकारात्मक विचारों के विरूद्ध दृढ़ प्राचीर
 समावेशी विकास  जलवायु परिवर्तन
समावेशी समाजराष्ट्रीय सुरक्षा के खतरो – साइबर युद्ध,ड्रोन
सामाजिक कल्याण
  • उपलब्धियाँ
  • नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम
  • संकर बीज कार्यक्रम
  • अंतरिक्ष कार्यक्रम मंगलयान चन्द्रयान
  • टीकों एवं जेनेरिक दवाएँ
  • लिगो
  • लिगो (Ligo)
  • लैजर इंटरफैमीटर ग्रैवीटेशनल – वेव ऑब्जरवेर
  • गुरूत्व तंरगों के अस्तित्व के बारे में जानकारी उपलब्ध करवाता है।
  • USA + India (भारत में) www.shivagstudypoint.com
  • फरवरी में महाराष्ट्र के हम्बोली जिले के स्थान पर इससे सम्बंधित डिडेक्टर लगाये जाएगे।
   1. राजारमना सेन्टर फॉर एडवॉस लयसिहे, इंदौर।
2. इन्टीट्यूट ऑफ प्लाज्मा रिसर्च – अहमदाबाद।
3.इंटर यूनिवर्सिटी फॉर सेंटर फॉॅर आस्ट्रोनॉमी एवं एस्ट्रोफिजिक्स – पुर्ण।
  • अनुसंधान और विकास व्यय R&D
  1. अनुसंधान पर सरकारी व्यय पिछले दो दशकों में GDP के 0.6-0.7% बीच गतिरूद्ध रहा है।
  2. R&D पर भारत द्वारा किया जाने वाला व्यय (0.6%) प्रमुख देशों जैसे USA (2.8), चीन (2.0),  इजरायल (4.3), कोरिया (4.2) से बहुत कम है।
  3. R&D पर व्यय केन्द्र सरकार द्वारा किया जाता है और इसमें राज्य सरकार का व्यय सीमित रहता है।
  4. अनुसंधान कार्य विभिन्न सरकारी विभागों के अंतर्गत विशिष्ट अनुसंधान संस्थाओं में ही सकेन्द्रित है, इससे विश्वविद्यालय मुख्यतया शिक्षण की भूमिका निभाने तक ही सीमित रह जाते है।
  • विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित (STEM) में पीएचडी
  • अमेरिका में स्टेम से पीएचडी करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या चीनी विद्यार्थियों की तुलना में आधे से भी कम है। ऐसा क्यो ?
  1. शायद मास्टर डिग्री के बाद अधिक आकर्षक विकल्पों के चलते।
  2. वीजा के साथ कार्य करने की बढ़ती चुनौतीयों के कारण।
  • भारत में में नामांकन की संख्या बढ़ रही है। ऐसा क्यो ?
  1. फैलोशिप की संख्या और प्रमात्रा में पर्याप्त वृद्धि जैसे आईआईटी में प्रधानमंत्री अनुसंधान फैलोशिप। www.shivagstudypoint.com
  • परिणाम (आउटपुट) – भारत में प्रकाशनों और पेटेंटों पर विचार करने से भारतीय अनुसंधान की उत्पादकता एवं गुणवता का आकलन करने में मदद।
            प्रकाशन        पेटेंट
2013 में वैज्ञानिक प्रकाशन में भारत का विश्व में 6 वाँ स्थान था। विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO) के अनुसार, भारत विश्व में 7 वाँ सबसे बड़ा पेटेंट फाइल करने वाला देश है।
वैश्विक प्रकाशनों में भारत की हिस्सेदारी 2009 के 3.1 से बढ़कर 2014 में 4.4 हो गई।

भारत में प्रति व्यक्ति पेटेंट कम है। ऐसा क्यो ?

  • निम्न मध्यम आय स्तर का होना।
  • अनुसंधान और विकास पर कम बल देना।
मोटा शुल्क लेकर समकक्ष व्यक्ति द्वारा की गई समीक्षा रहित पांडुलिपियों का प्रकाशन किया जाता है।जहां विदेशी क्षेत्राधिकार में भारत के पेटेंट आवेदन और पेटेंट प्रदान करने में तेजी से वृद्धि हुई लेकिन घरेलू प्रणाली में नहीं।
हालांकि प्रकाशनों की गुणवता पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी है।2005 में भारत अन्तर्राष्ट्रीय पेटेंट व्यवस्था में शामिल हुआ जिससे घरेलू पेटेंट में वृद्धि हुई किन्तु 2008 के बाद से कमी बनी हुई है।
  • भारत में अनुसंधान और विकास विस्तार : भावी योजना
  • भारत को अपना प्रसास दोगुना करना होगा।
  • R&D पर राष्ट्रीय व्यय को दोगुना करना होगा।
  • इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र को आगे आना होगा।
  • विश्वविद्यालयों की भूमिका को बढ़ाना होगा।
  • क्या किया जाए ?
  1. स्कूली स्तर पर गणित और बोध कौशल को बढावा देना।
  2. जांचकर्त्ता प्रेरित अनुसंधान को प्रोत्साहित करना।
  3. निजी क्षेत्र और राज्य सरकारों द्वारा अनुसंधान हेतु निधियन को बढ़ाना।
  4. राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं को विश्वविद्यालयों से जोड़ना तथा नये ज्ञान परितंत्र का निर्माण।
  5. अनुसंधान एवं विकास के लिए मिशन प्रेरित दृष्टिकोण
    a. डार्कमैंटर पर राष्ट्रीय मिशन – मूलभूत विज्ञान।
    b. जीनोमिक्स पर राष्ट्रीय मिशन।
    c. ऊर्जा भंडारण प्रणाली पर राष्ट्रीय मिशन।
    d. गणित पर राष्ट्रीय मिशन। www.shivagstudypoint.com
    e. साईबर फिजिकल प्रणाली पर राष्ट्रीय मिशन।
    f. कृषि सम्बंधी राष्ट्रीय मिशन।
  6. प्रवासी वैज्ञानिक निपुणता का लाभ उठाना।
  7. अनुसंधान के माहौल में सुधार।
  8. विज्ञान एवं अनुसंधान प्रतिष्ठानों द्वारा अधिकाधिक सहयोग सहयोग।
  9. ज्ञान मिशन।
  • साईबर फिजिकल प्रणाली (CPS) – इसका तात्पर्य प्राकृतिक विश्व के संदर्भ में मशीन आधारित संचार, विश्लेषण, अनुमान, निर्णय, कार्यवाही एवं नियंत्रण से है।
  • उच्चतर आविष्कार योजना –  (निजी क्षेत्र + सरकार) – मशीन स्थापित – नवाचार प्रोत्साहित  करेगे।

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Que. 19. भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने कई नई उँचाइयों को छुआ है। नये भारत के स्रजन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका पर चर्चा करें।

Ans. विज्ञान और प्रौद्योगिकी मानव के जीवन को सरल एवं सहज बनाने का कार्य करती है। भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने कई नई उँचाइयों को छुआ है जैसे –

  • नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम।
  • संकर बीज कार्यक्रम। www.shivagstudypoint.com
  • अंतरिक्ष कार्यक्रम – मंगलयान, चन्द्रयान
  • टीकों एवं जेनेरिक दवाएँ
  • लिगों

भारत सरकार 2022 तक न्यू इंडिया के सृजन का कार्य कर रही है जिससे विज्ञान और प्रौद्योगिकी महत्वपूर्ण भूमिका है जैसे –

  1. राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे जैसे साइबर युद्ध, मानवरहित ड्रोन की चुनौतियों से निपटने में सहायक है।
  2. यह समाज में तथ्य एवं प्रमाणों का पुष्टिकरण करता है जिसके कारण समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास होता है परिणामस्वरूप समाज में व्याप्त नकारात्मक विचारों यथा संकीर्णता, साम्प्रदायिकता इत्यादि के विरूद्ध एक सुदृढ़ प्राचीर की तरह कार्य करता है।
  3. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नवाचार को बढ़ावा देती है परिणामस्वरूप एक समावेशी समाज का विकास होता है।
  4. स्वच्छ भारत मिशन के सफल हुए बिना न्यू इंडिया एकमात्र कल्पना है, इसलिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के द्वारा ठोस कचरे के प्रबंधन तथा स्वच्छ ऊर्जा के स्रोतों का विकास करता है।

          वस्तुतः इस प्रकार विज्ञान और प्रौद्योगिकी, सभ्य समाज जो सामाजिक कल्याण से परिपूर्ण समावेशिता लिए हुए है, आधुनिक अर्थव्यवस्था का इंजन है।

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Que. 20. भारत में अनुसंधान और विकास की दशा को संदर्भित करते हुए बताये कि स्टेम क्षेत्र में पीएचडी करवाने वाले नामांकन अमेरिका में करने वाले की तुलना में भारत में क्यों बढ़ा है ? तर्कसहित उत्तर दीजिए।

Ans. भारत के ऐतिहासिक काल के गर्भ को देखा जाए तो यह कहा जा सकता है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की अग्रणी भूमिका थी जैसे – शून्य की खोज, शल्य चिकित्सा इत्यादि। www.shivagstudypoint.com

           लेकिन भारत की वर्तमान में अनुसंधान और विकास की दशा का मूल्यांकन किया जाए तो यह कहना ज्यादा तर्कसंगत होगा कि –

  • भारत अपनी जीडीपी का मात्र 0.6 – 0.7 प्रतिशत भाग पैसा ही अनुसंधान पर खर्च कर रहा है जबकि इजरायल, कोरिया, चीन और यूएसए से बहुत कम है।
  • अनुसंधान कार्य केवल सरकारी विभागों तक सीमित है जबकि विश्वविद्यालय मात्र शिक्षा के केन्द्र तक ही सीमित हो गए।
  • अनुसंधान और विकास कार्य में केवल केन्द्र सरकार के द्वारा ही ज्यादा निवेश किया जाता है।

इस प्रकार देखा जाए तो इस क्षेत्र में अभी भारत को ओर भी ज्यादा पैसा लगाने की जरूरत है।

         विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित (स्टेम – ) में पीएचडी करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या अमेरिका में चीन की तुलना में अत्यंत कम है तथा भारत में नामांकन की संख्या में वृद्धि हुई है क्योंकि –

  • मास्टर डिग्री के बाद अधिक आकर्षण विकल्पों का होना।
  • वीजा के साथ कार्य करने की बढ़ती चुनौतियों के चलते।
  • भारत में फैलोशिप योजना का संचालन जैसे आईआईटी में प्रधानमंत्री अनुसंधान फैलोशिप।

इस प्रकार से भारत में स्टेम के नामांकनों में वृद्धि दर्ज की गई है जो भारत के लिए शुभ संकेत है क्योंकि इससे भारत निवल उपभोक्ता से निवल उत्पादक में बदल जाऐगा।

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Que. 21. “शोध प्रकाशन पत्र एवं पेटेंट अनुसंधान की उत्पादकता एवं गुणवता का आकलन करने में सहायक है।” इस संदर्भ में भारतीय स्थिति का मूल्यांकन कीजिए।

Ans. शोध प्रकाशन – पत्र एवं पेटेंट अनुसंधान की उत्पादकता एवं गुणवता का आकलन करने में सहायक होता है क्योंकि –

  • यदि भारत के शोध प्रकाशन पत्र में वृद्धि हो रही है तो यह सीधे तौर पर अनुसंधान की उत्पादकता की ओर इशारा करते है क्योंकि इससे एक नये नवाचार का जन्म होता है।
  • यदि भारत के यही शोध प्रकाशन पत्र एक नये विचार को जन्म देकर उसके द्वारा नया उत्पाद बनाने में सहायक होता है तो पेटेंट में वृद्धि होती है जो उसकी गुणवता को प्रतिबिम्बित करती है परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था के विकास में सहायक होता है।

इस संदर्भ में भारतीय स्थिति का मूल्यांकन किया जाए तो –

  1. भारत में अभी प्रकाशन पत्रों के प्रकाशन में विश्व में 6 वाँ स्थान है, जबकि पेटेंट में 7 वाँ स्थान है। www.shivagstudypoint.com
  2. भारत के प्रकाशन पत्रों में वृद्धि तो हुई है किन्तु यह नकारात्मक है क्योंकि मोटा शुल्क लेकर इसके समकक्ष व्यक्ति द्वारा समीक्षा रहित पाण्डुलिपियों का प्रकाशन किया जाता है।
  3. भारत में प्रतिव्यक्ति पेटेंट की संख्या अत्यंत कम है क्योंकि निम्न मध्य आय तथा आरएण्डडी पर कम पैसा खर्च करना।
  4. 2005 के बाद पेटेंट में वृद्धि हुई है यथा विदेशी क्षेत्राधिकार के क्षेत्र में जबकि घरेलू क्षेत्र में 2008 के बाद लगातार कमी देखी गई।

        वस्तुतः इस प्रकार यह यथास्थिति भारत की इस क्षेत्र में हुई प्रगति को बयां करती है किन्तु वर्तमान में प्रकाशनों की गुणवता में वृद्धि हो रही है साथ पेटेंट की संख्या भी बढ़ रही है।

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Que. 22. विज्ञान और प्रौद्योगिकी में किए गए नवोन्मष किसी भी राष्ट्र के दीर्घकालिक विकास और गतिशीलता का अभिन्न अंग होता है। इस क्षेत्र में सुधार करने के लिए निजी क्षेत्र किस प्रकार भूमिका निभा सकता है ? स्पष्ट करें।

Ans. विज्ञान और प्रौद्योगिकी में किए गए नवोन्मेष किसी भी राष्ट्र के दीर्घकालिक विकास और गतिशीलता का अभिन्न अंग होता है क्योंकि –

  • किसी भी क्षेत्र में हुआ नवाचार उसकी गतिशीलता को बढ़ा देता है क्योंकि इससे नई प्रौद्योगिकी का जन्म होता है जो संतृप्त बाजार को असंतृप्त बाजार में परिवर्तन कर देता है।
  • इससे नवाचार से वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बल मिलता है जो तथ्य प्रमाणों पर बल देता है परिणामस्वरूप समाज सभ्य एवं समावेशी होता है क्योंकि इससे संकीर्णता और साम्प्रदायिकता समाप्त होती है।
  • इससे मानव सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होती है।
  • इससे जलवायु परिवर्तन के अनुरूप कृषिगत प्रणाली का विकास किया जा सकता है।

     वस्तुतः कहा जाता है कि संसाधनों के अभाव में अनुसंधान और विकास कार्य सम्पन्न नहीं होते है उसके लिए आर्थिक संसाधन और मानव संसाधन की आवश्कता होती है। इसलिए कहा जाने लगा कि विश्वविद्यालयों के पास मानव संसाधन तो है किन्तु आर्थिक संसाधन नहीं जबकि निजी क्षेत्र की कंपनियों के पास आर्थिक संसाधन है।

इस प्रकार निजी क्षेत्र की कंपनियाँ इसमें भूमिका निभा सकती जिससे –

  1. विश्वविद्यालय में आरएण्डडी से सम्बंधित आधार संरचना का विकास।
  2. कंपनी को नई तकनीक एवं प्रशिक्षित कर्मी उपलब्ध हो जाऐगे।
  3. नवाचार के पेटेंट से रोजगारों एवं आय में वृद्धि होगी।

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Que. 23. भारत में अनुसंधान और विकास के विस्तार के लिए आप किस प्रकार के कदम उठाना पसंद करेगें और क्यों ?

Ans. विज्ञान और प्रौद्योगिकी एवं नवोन्मेष किसी भी समान के लिए सहायक और अंतनिर्हित महत्व रखते है। वे आर्थिक उत्पादन और सामाजिक बेहतरी के मुख्य संचालक होते है। www.shivagstudypoint.com

इसलिए भारत में अनुसंधान और विकास के विस्तार के निम्न उपाय किए जा सकते है क्योंकि –

  • केन्द्र सरकार को अपने वर्तमान स्तर से जीडीपी का दोगुना पैसा खर्च करना चाहिए क्योंकि इससे देश में नई तकनीक का विस्तार होगा।
  • निजी क्षेत्रों और राज्य सरकारों द्वारा इसमें निधि को बढ़ाना क्योंकि जनसंख्या एवं विकास सम्बधित समस्या का समाधान किया जा सकता है।
  • राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं को विश्वविद्यालयों से जोड़ दिया जाए क्योंकि राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में बेहतर अध्यापक है तो विश्वविद्यालयों युवा छात्र वर्ग।
  • इसके लिए मिशन प्रेरित दृष्टिकोण को अपनाया जाना चाहिए क्योंकि इससे विशेष क्षेत्र में नवाचार को प्रोत्साहन मिलता साथ ही उस क्षेत्र से सम्बंधित समस्या का समाधान भी हो जाता है, जैसे – ऊर्जा भण्डारण प्रणाली पर राष्ट्रीय मिशन, कृषि सम्बंधी विषय पर राष्ट्रीय मिशन।
  • जांचकर्त्ता प्रेरित अनुसंधान को प्रोत्साहित करना चाहिए क्योंकि इससे विशेषज्ञों का लाभ मिलेगा।

      वस्तुतः अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में निवेश अर्थव्यवस्था के साथ ही सामाजिक परिवर्तन का उत्प्रेरक भी है।

8. व्यवसाय करने को आसान बनाने का अगला मोर्चा : समय से न्याय

भारत विश्व बैंक की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस, 2018 में पहली बार 30 स्थान उछलकर चोटी के 100 देशों की श्रेणी में शामिल हुआ है। भारत कराधान तथा शोधन अक्षमता से संबंधित संसूचकों में क्रमशः 53 और 33 स्थान ऊपर आया है। कराधान में प्रशासनिक सुधार तथा शोधन अक्षमता और दिवालियापन संहिता आईपीसी 2016 को पारित किए जाने के कारण हुआ है।

  • अल्पसंख्यकों के हितों को सुरक्षा।
  • रोजगार शुरू करने की इच्छा रखने वाले व्यक्तियों को ऋण उपलब्ध कराना।
  • बिजली उपलब्ध कराना।

भारत संविदा प्रवर्तन को लागू करने और अपीलीय एवं न्यायिक क्षेत्रों में लगातार लम्बित होने तथा निपटान कार्यो में देरी तथा कार्य संचय के मामलों में पिछड़ रहा है।

संविदा प्रवर्तन को बेहतर करने के लिए सरकार द्वारा उठाये गए कदम –

  1. अप्रयुक्त हो चुके 1000 से अधिक कानूनों को समाप्त करना।
  2. ट्रिब्यूनलों को युक्ति संगत बनाना।
  3. मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम 2015 में संशोधन।
  4. उच्च न्यायालय का वाणिज्यिक न्यायालय, वाणिज्यिक प्रभाग तथा वाणिज्यिक अपील प्रभाग अधि, 2015 पारित करना।
  5. लोक अदालतों का विस्तार। www.shivagstudypoint.com
  6. अंतः सरकारी कानूनों में कमी।
  7. कानूनी सांतव्य हेतु भावी कानूनी व्यवस्था का आरंभ।
  8. राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड का विस्तार।

प्रमुख निष्कर्ष –

  • विलंबन और देरी – आर्थिक मामलों के निपटान में देरी और विलंबता कई मुद्दों जैसे – रूकी हुई परियोजनाओं, कानूनी लागत में वृद्धि, कर राजस्व में वृद्धि और निवेश में कमी के कारण बने।

a. आर्थिक ट्रिब्यूनल – 1. मामलों में लंबित होने की स्थिति उच्च स्तर की है। औसत अवधि 3.8 वर्ष है।

      2. समय के साथ लम्बन तीव्रता से बढ़ा है। इससंचार एवं विद्युत क्षेत्र में हिया के हस्तक्षेप के कारण।

b. उच्च न्यायालय –   1. लम्बित होने की स्थिति में वृद्धि जारी है।

   2. आर्थिक मामलों की संख्या, अन्य मामलों की श्रेणियों की तुलना में कम है। परन्तु उनके लम्बित होने कि स्थिति की औसत अवधि 4.3 वर्षों के साथ सबसे खराब है।

  • विलम्बन और देरी के कारण –

A. विवेकाधीन क्षेत्राधिकार में विस्तार के कारण काम के बोझ में वृद्धि

  • यिकि 226 तथा 227 के प्रावधानों की व्याख्या। www.shivagstudypoint.com
  • काहा के द्वारा अन्य क्षेत्राधिकारों के कार्य क्षेत्र में संतुलन बनाना या दक्षता बिना सुधार लागू करना।

B. मूल क्षेत्राधिकार से उच्च न्यायालय पर कार्य कर अतिभार –

  • काकि  सिविल मामलों के निपटान में जिला न्यायालयों की तुलना में अधिक समय।
  • कुछ हि   का अन्य मूल क्षेत्राधिकार होता हैं

C. उच्चतम न्यायालय के विशेष अनुमति याचिका के क्षेत्राधिकार में विस्तार – 136 किसी भी पक्ष को किसी भी न्यायालय या अधिकरण से सीधे उच्चतम न्यायालय को जाने का अधिकार प्रदान करता है।

D. निषेधाज्ञाओं और स्थगनादेशों का सहारा।

  • लम्बन और देरी की लागते –
  1. परियोजना मुख्यतः ऋण द्वारा पोषित होती है। स्थगन की अवधि के कारण परियोजना लागत में संभावित वृद्धि लगभग 60 प्रतिशत की गई है।
  2. कॉर्पोरेट क्षेत्र के विधिक खर्चो को भी बढ़ाया है। www.shivagstudypoint.com

उपरोक्त स्थितियों के समाधान के उपाय –

  • निचले न्यायालयों में न्याय व्यवस्था की क्षमता में विस्तार करने और उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय के मौजूदा भार को कम करने की आवश्यकता है।
  • न्याय व्यवस्था और उसके आधुनिकीकरण पर व्यय की मात्रा में वृद्धि की जाए।
  • निषेधाज्ञाओं एवं स्थगनादेशों का सहारा कम लेना।
  • न्यायालय मामला प्रबंधन तथा न्यायालय स्वचालित प्रणाली को सुधारा माना।
  • विषय-वस्तु एवं स्तर विशिष्ट न्यायपीठों की स्थापना करना।

महत्वपूर्ण तथ्य –

Art. 136 :-

विशेष छुट्टी याचिकाएँ । www.shivagstudypoint.com
भारत के सुप्रीम कोर्ट के हाथों में अवशिष्ठ शक्ति के रूप में प्रदान की जाती है।
यह पीड़ित पार्टी को किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण के किसी भी फैसले या आदेश के खिलाफ अपील में सर्वोच्य न्यायालय में सुनवाई की विशेष अनुमति प्रदान करता है।

Art. 226 :-

उच्च न्यायालय को यह अधिकार प्राप्त है कि वह निर्देश, आदेश या प्रादेश का निर्गम केवल संविधान प्रदत्त अधिकारों के प्रवर्तन के लिये ही नहीं, अपितु किसी अन्य उद्देश्य के लिये भी कर सकता है।
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण
  • परमादेश
  • निषेध
  • उत्प्रेषण
  • अधिकार पृच्छा

Art. 227 उच्च न्यायालयों द्वारा सभी अदालतों पर अधीक्षण की शक्ति।

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Que. 24. अपीलिय तथा न्याय क्षेत्रों में लम्बित, विलंबित तथा अनिर्णीत मामला ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को प्रभावित करता है। व्यवसाय को आसान बनाने के लिए किए जा रहे प्रयासों का वर्णन करते हुए बताये कि ये आर्थिक क्रियाकलापों को कैसे बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगे ?

Ans. अपीलिय तथा न्याय क्षेत्रों में लम्बित, विलंबित तथा अनिर्णीत मामला ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को प्रभावित करता है क्योंकि –

  • इसके कारण विवादों का समाधान जल्दी नहीं हो पाता है परिणामस्वरूप कारोबारी कारोबार नहीं करते है। www.shivagstudypoint.com
  • इसके कारण कॉरर्पोरेट क्षेत्र का विधिक खर्चों में वृद्धि हो जाती है जिसके लागत में वृद्धि हो जाती है।
  • विलंबन के कारण परियोजनाओं को स्थापित करने में समय अधिक लग जाता है जिससे उसकी लागत बढ़ जाती है क्योंकि परियोजना या कंपनियाँ मुख्यतः ऋण से काम करती है।

          इसलिए तो सरकार विवाद समाधान के लिए मध्यस्थता केन्द्रों की स्थापना कर रही है। इसी कारण से सरकार कारोबारी सुगमता में वृद्धि के लिए निम्न कार्य किए है जो इस प्रकार है –

  • अप्रयुकत हो चुके 1000 से अधिक कानूनों को समाप्त करना।
  • ट्रिब्यूनलों को ज्यादा युक्तिसंगत बनाया जाना।
  • लोक अदालतों की स्थापना।
  • राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड का विस्तार।
  • मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम।

उपरोक्त प्रयासों के परिणाम स्वरूप आर्थिक क्रियाकलापों में वृद्धि होगी क्योंकि –

  • लोक अदालतों की स्थापना से आर्थिक मामलों पर त्वरित न्याय सुनिश्चित हो सकेगा जिससे परियोजनाओं का तीव्र क्रियान्वयन होगा।
  • निवेश में वृद्धि होगी।
  • कर उगाही में अवरोध उत्पन्न नहीं होगा।
  • अदालतों में आर्थिक मामलों पर खर्च कम हो जाऐगा।

वस्तुतः कारोबार सुगमता के लिए न्यायिक सुगमता जरूरी है।

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Que. 25. मामलों के विलंबन और देरी के कारणों को स्पष्ट कीजिए। क्या सरकार द्वारा किए गए प्रयास इनसे निपटने मे सहायक सिद्ध होगा ? तथा आप किस प्रकार के सुझाव देना पसंद करेगे ?

Ans. मामलों के विलंबन और देरी के निम्नलिखित कारण है, जैसे –

  • निषेधाज्ञाओं और स्थगनों का ज्यादा उपयोग करना।
  • उच्चतम न्यायालय का विशेष छुट्टियाँ याचिका के क्षेत्राधिकार में विस्तार।
  • मूल क्षेत्राधिकार से उच्च न्यायालय का कार्य का अतिभार।
  • विवेकाधीन क्षेत्राधिकार में विस्तार के कारण।

              उपरोक्त कारणों के कारण न्यायालयों के ऊपर बोझ बढ़ जाता है परिणामस्वरूप आर्थिक मामालों पर त्वरित न्याय नहीं हो पाता है जिसके कारण भारत में कारोबार सुगमता में जटिलता उत्पन्न होती है इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने कई प्रयास किए है जो इस प्रकार है –

  • लोक अदालतों की स्थापना करना। www.shivagstudypoint.com
  • ट्रिब्यूनलों, न्यायपीठों की स्थापना से सम्बंधित प्रावधान करना।
  • अप्रयुक्त हो चुके 1000 से अधिक कानूनों को समाप्त करना।
  • मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम लाना।

     वस्तुतः उपरोक्त उपायों से इनका समाधान संभव है किन्तु इसके लिए ओर भी उपाय किए जा सकते है जैसे –

  • निम्न न्यायालयों की क्षमता में विस्तार करके जैसे कुछ आर्थिक मामलों पर इनको अधिकार देना।
  • न्यायिक व्यवस्था का तकनीकीकरण एवं आधुनिकीकरण करके।
  • विषेधाज्ञाओं ओर स्थगनों का कम विस्तार करके।
  • विषय वस्तु आधारित न्यायपीठों का गठन करना।

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Que. 26. मामलों का विलंबन और देरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है, वहीं दूसरी ओर न्यायिक प्रणाली में विश्वास को भी कम करती है। इस कथन के आलोक में लोक अदालतों को परीक्षण कीजिए।

Ans. मामलों का विलंबन और देरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है क्योंकि –

  • इसके कारण न्याय में देरी होती है जिसके कारण निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • इसके कारण परियोजनाओं की लागत में वृद्धि हो जाती है।
  • इसके कारण कॉर्पोरेट क्षेत्र के विधिक कार्यों के खर्चों में वृद्धि हो जाती है।

वहीं दूसरी ओर मामलों के विलंबन के कारण न्यायिक प्रणाली में विश्वास को भी कम करता है क्योंकि –

  • इसके कारण न्याय त्वरित नहीं हो पाता है जिसके कारण समय पर न्याय नहीं होने से न्यायलय के प्रति विश्वास को कम करता है। www.shivagstudypoint.com
  • कहां जाता है कि न्याय होना ही नहीं चाहिए बल्कि वादी को न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए। यह तभी संभव है जब मामलों का विलंबन न हो। लेकिन विलंबन की स्थिति में लोगों के विश्वास को कमजोर करता है।

        इसी कारण से सरकार ने लोक अदालतों की स्थापना की है। जिसके कारण न्यायालयों के ऊपर मुकदमों के बोझ में कमी आयी है साथ ही आर्थिक मामलों पर त्वरित निर्णय होने शुरू हो गये जिससे अर्थव्यवस्था को गति मिली। इसके साथ ही मुकदमों के बोझ को कम कर लोक अदालतों ने न्याय को समय पर करके न्यायिक प्रणाली में लोगों का विश्वास बढ़ाया है।

किन्तु इन लोक अदालतों का परीक्षण किया जाए तो यह कहना ज्यादा तर्कसंगत होगा कि –

  • एक ओर तो प्रशासन ने इसमें ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाई है। क्योंकि व इनको अपने प्रतिद्धंदी के रूप में देखने लगे।
  • सामाजिक कटुता ने भी इनको सफल होने से रोका है।

     वस्तुतः यह कहना ज्यादा तर्कसंगत होगा कि लोकअदालतों ने इसके बावजुद अपनी महत्ती भूमिका निभाई है।

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