खेलोगे – कूदोगे बनोगे नवाब

खेलोगे – कूदोगे बनोगे नवाब

भारत एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था वाला देश रहा हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को अपनी आजीविका की चिंता थी फलस्वरूप अपने बच्चों को आजीविका के प्रति ज्यादा सचेत करते हुए एक कहावत को गढ़ दिया कि “पढ़ोगे – लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे – कूदोगे तो बनोगे खराब।” इस कहावत के माध्यम से बच्चों के बालमन में खेलों के प्रति नकारात्मक अभिवृति पैदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

              हम उपर्युक्त निम्बंध की शुरूआत एक कहानी के माध्यम से करते है जो खेलों की मार्मिकता को अपने आप में समेटे हुए है।

             भारत के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र की बात है जहाँ पर ग्रामीण किसान परिवारों के बच्चे अपने बालमन को उड़ान देने के लिए पढ़ाई-लिखाई के लिये एक छोटे से प्राथमिक स्कूल में जाते थे। वैसे भी तो कृषि लाभ का व्यवसाय न रहने के कारण एक माता-पिता का कर्त्तव्य होता है कि अपने बच्चे को नवाब बनाया जाए। एक दिन उस स्कूल के सभी बच्चों को एक छात्र ने अपने बालमन में उपजे कोमल विचार खेल खेलने चले को सभी के सामने सार्वजनिक किया तो सभी ने उसको सनक भरी नजरों से देखने लगे। लेकिन स्वामी विवेकानंद के विचार उसको हमेशा प्ररेणा दे रहे थे कि आत्मविश्वासी व्यक्ति ही इतिहास बनाते है वरना वे स्वयं इतिहास बन जाते है। वह छात्र अकेला ही मैदान में हमेशा कुछ समय के लिये खेलने चला जाता था, धीरे-धीरे उसको आत्मविश्वास के साथ आत्मबोध की भावना भी महसूस होने लगी। एक समय ऐसा आया कि उस स्कूल के सभी बच्चे बार-बार बीमार होने लगे किन्तु जो खेल को ही अपनी प्रेमिका मान बैठा वह हमेशा ऊर्जावान, हर्ष बना रहता था। मानो कि उसको कई से ऊर्जा का संचार हो रहा है।

             कालांतर में खेल-खेल में ही वह इतिहास बना गया तथा हमेशा के लिए भारत का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखवा दिया। उस छात्र का नाम हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचन्द था।

                 उपर्युक्त प्रसंग खेलों के प्रति भारतीय समाज के दृष्टिकोण को प्रतिबिम्बित करता हुआ प्रतीत हो रहा है। किसी राष्ट्र की प्रतिष्ठा खेलों में उसकी उत्कृष्टता से बहुत ही सम्बंध रखती है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलों में अच्छा प्रदर्शन केवल पदक जीतने तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह किसी राष्ट्र के स्वास्थ्य, मानसिक अवस्था तथा लक्ष्य के प्रति सजगता को भी सूचित करता है। प्रश्न यह उठता है कि भारत में स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी खेल का जितना विकास होना चाहिए उतना नहीं हो पाया, इसके पीछे क्या-क्या कारण जिम्मेदार है ?

खेल में भारत के पिछड़ने के कारण :-

  • शिक्षा में खेल का अभाव
  • समाज की मानसिकता
  • बुनियादी संरचना का अभाव
  • खेल प्रौद्योगिकी पर कम खर्च
  • कॉर्पोरेट क्षेत्र का खेल में कम योगदान
  • राजनीतिक प्रतिबद्वता का अभाव

           उपर्युक्त कारण हमारे से 2 वर्ष बाद स्वतंत्र हुए चीन से खेल में पछाड़ दिया है। वह आज पूरे विश्व में खेल की दूनियां में लौहा मनवा चुका है। इसके पीछे प्रमुख कारक जिम्मेदार थे, जैसे-

  1. राजनीतिक प्रतिबद्वता का होना।
  2. खेल आधारभूत संरचना का विकास।
  3. प्रत्येक क्षेत्र में खेल संघों की स्थापना तथा राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखना।

          जब हम खेल के प्रभावों की बात करें तो हमारे सामने इसके अनेक प्रभाव वाले क्षेत्र उभर कर सामने आते है, जैसे-

स्वास्थ्य – खेल मानव को स्वस्थ बनाता है। कहा भी जाता है कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मानसिक का विकास होता है। यह सच में छोटी सी बात लगती है बल्कि इसके निहितार्थ कई है। जो छात्र खेल के प्रति उदासीन होते है उनका शारीरिक मानसिक विकास अवरूद्ध हो जाता है।

सामाजिक कौशल – जो बच्चा खेलों में भाग लेता है उसका सामाजिक कौशल का विकास ज्यादा होता है। वह अपने दोस्तों से मिलता-जुलता रहता है। सामाजिक गतिविधि में भाग लेता है।

जीत एवं हार के महत्व का प्रभाव – जीत एवं हार जीवन का हिस्सा है। खेल व्यक्ति को मजबूत बनाता है तथा उसे हारने पर निराश होने से बचाकर अवसाद से बाहर निकलने की कला सीखाता है।

समर्थन एवं सहनशीलता – खेल व्यक्ति को समर्पण एवं सहनशीलता के गुण सीखाता है। वह अपने लक्ष्य के प्रति कितना समर्पित है।

खेल रिश्तों को सुधारता – खेल टूटे, बिगड़े रिश्तों को सुधारने का कार्य करता है। इसलिए विदेश नीति में खेल कुटनीति का भी सहारा लिया जाता है। क्योंकि खेल पीपुल टू पीपुल संवाद को बढ़ाता है जो वैदेशिक सम्बंधों को प्रागाढ़ता प्रदान करता है। जैसे – भारत-पाकिस्तान

रोजगार – आज भारत में खेल को एक रोजगार के अवसर के रूप में देखने की भावना विकसित हुई जो सराहनीय है।

             इस प्रकार खेल हमारे जीवन के साथ राष्ट्र के समक्ष चुनौतियों को भी कम रहा है। भारत में एक तरफ क्रिकेट को मानो धर्म का दर्जा दे रखा हो तो दूसरी तरफ अन्य खेलों के प्रति उपेक्षा का भाव। आज विश्व में यदि भारतीय खेल का नाम लिया जाए तो वह एकमात्र क्रिकेट ही है जो शौहरत और दौलत से लबालब है किन्तु अन्य खेल प्रतिस्पर्द्धा में ही नहीं है जो हमारे लिये दुःख की बात है क्योंकि जिस मेजर ध्यानचन्द ने हॉकी को पूरे विश्व में भारत की पहचान बनाई उसको बनाये रखना भी हमारे बस की नहीं रही। आज हम मात्र राष्ट्रीय खेल दिवस मनाकर खेल के प्रति अच्छे दृष्टिकोण को बयां कर रहे है लेकिन यह प्रयास रंग लेकर आये तो मेजर ध्यानचंद को सच्ची श्रृद्धांजलि अर्पित होगी।

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इसलिए अब खेलों में सुधार का समय आ गया है। जो इस प्रकार है-

  • खेल से सम्बंधित आधारभूत संरचना का विकास किया जाए।
  • सरकार को खेल को इस प्रकार प्रदर्शित करें कि इससे स्वास्थ्य, रोजगार के अवसर के रूप में देखे। इस पर उपर्युक्त रणनीति हो।
  • खेल में बिना भेदभाव के तथा राजनीतिक हस्तक्षेप के आधार पर वरीयता न मिले। बल्कि खेल में भी अवसर की समानता की बात की जाए।
  • खेल मंत्रालय की जगह राष्ट्रीय खेल परिषद का गठन किया जाए तथा इनके पदों पर खेल से सम्बधित व्यक्तियों की नियुक्ति की जाए। स्वायतता भी हो।
  • बेहतर प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने के साथ बेहतर प्रशिक्षणकर्ता उपलब्ध कराया जाए।
  • खेल संघों की नियमित ऑडिट हो।

       उपर्युक्त सुधारों की दिशा में सरकार ने कई कार्यक्रमों की श्रृंखला को शुरू किया जैसे-

समग्र शिक्षा अभियान – इसके तहत सरकार स्कूली स्तर से ही बच्चों में खेल की भावना का विकास कर रही है। अर्थात् बच्चों के सर्वागीण विकास के लिये शिक्षा के साथ खेल भी जरूरी। इसके लिए एकमुश्त राशि उपलब्ध करवाकर खेल सामग्रियों के खरीदने पर बल दिया गया।

टेलेंट सर्च पोर्टल – ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों में खेल प्रतिभा विद्यमान होती है किन्तु यह आगे बढ़ नहीं पाते है। इसलिए सरकार इनको आगे लाने के लिए इसकी शुरूआत की।

खेलो इंडिया प्रोग्राम – इसके तहत सरकार ने कुछ लक्ष्य तय किए है जैसे –

  • प्रतिवर्ष अलग-अलग खेलों में एक हजार खिलाड़ियों का चयन।
  • चुने गए खिलाड़ियों को लगातार 8 वर्ष तक 5 लाख रूपये की आर्थिक सहायता।
  • देशभर में 20 विश्वविद्यालयों को खेलों के हब के रूप में विकसित करना है।

            यदि उपरोक्त सभी कार्य प्रतिबद्धता के साथ सम्पन्न किया जाए तो भारत को खेलों में आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता है।

             भारत को खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिये चाहे सालों लग जाएं, लेकिन डोर अगर सही हाथों में रही तो पंतग को उँची उड़ान भरने से कोई रोक नहीं सकता है।

            ये वक्तव्य प्रतिबद्धता के साथ कर्त्तव्यनिष्ठ एवं सत्यनिष्ठ होने की प्ररेणा देता है। चाहे राजनीति में हो या चाहे प्रशासनिक क्षेत्र में ।

             जब हम खेल के विषय में पढ़ रहे है तो हम खेल के प्रदर्शन की बात करना कैसे भूल सकते है ? वैसे भारत ने एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ गेम्स, राष्ट्रीय खेल, क्रिकेट खेल में तो काफी अच्छा सुधार किया है किन्तु जब हम ओलम्पिक गेम्स के बारे में विचार करते है तो हमारे जख्मों को हरा करने जैसा है। क्योंकि रियो 2016 में भारत के 119 सदस्य दल में मात्र 2 पदकों के साथ संतुष्ट होना पड़ा। जिसमें भी 2 पदक महिला वर्ग ने दिलाए है। इसलिए एक समेकित दृष्टिकोण से खेल में आगे बढ़ने की जरूरत है।

          पिछले कुछ वर्षों में फिल्म जगत ने भारतीयों के मन में खेल के प्रति दृष्टिकोण को बढलने के लिये काफी फिल्में फिल्माई है जो एक शुभसंकेत है जैसे – भाग मिल्खा भाग, चक दे इंडिया, सचिन तेंदुलकर, एम. सी. मेरीकॉम, दंगल तथा धोनी एक अनटॉल्ड स्टोरी इत्यादि। इन फिल्मों में सबसे ज्यादा दंगल एवं एम. सी. मेरीकॉम ने भारतीयों के दिल को छू लिया। जिसके बाद से भारत में लड़कियों को भी खेल में आगे बढ़ने का अवसर प्रदान किया जाने लगा।

ओर खेलना चाहते है हम, खुब खेलों साथ में हम, खेल से मुस्कान पाए हम, खेल से पहचान पाए हम, दुनियाँ को हिलाएगें, खेल के दिखाएगें, हम नहीं है किसी से कम।”

            उपर्युक्त वक्तव्य हर किसी को भाव विभोर कर सकता है। किन्तु आज खेलों की संस्कृति में अति बदलाव को देख हर किसी का मन विचलित कर रहा है क्योंकि एक जमाने में खेल का मतलब मैदान में जाकर खेलना जिससे भातृत्व एवं बधुत्व का विकास होता था किन्तु आज खेल का मतलब घर के एक कमरे में लगे कम्प्यूटर एवं मोबाइल पर कृत्रिम खेल खेलना। जिसके कारण बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास नहीं होता है। परिणामस्वरूप ये बच्चे अकेलेपन, अवसाद एवं चिड़चिड़ेपन का शिकार हो जाते है। जो समाज एवं राष्ट्र के समक्ष चिंता का विषय है। इसलिए अब हमारी मानसिकता में थोड़ा बदलाव करने का समय आ गया कि अब खेल को साधन एवं मानव के सर्वांगीण विकास को साध्य माना जाए।

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