1857 ई. का विद्रोह Part – 2

1857 ई. का विद्रोह Part – 2

लगातार भाग – 1 से …………>>> http://shivagstudypoint.com

विद्रोह का आरंभ और विस्तार :-

1. 29  मार्च, 1857 को बैरकपुर के सैनिक मंगल पांडे ने दो अंग्रेज अधिकारियों को मार क्रांति की शुरूआत कर दी। मंगल पांडे को गिरफ्तार कर फांसी दी गयी तथा टुकड़ी भंग कर दी गयी इसमें ज्यादातर सिपाही अवध के थे। उन लोगों ने इस घटना का प्रचार किया।

        इस विद्रोह के संकेतस्वरूप उतरी भारत में चपातियाँ तथा कमल के फूल एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजे गये। ये क्रांति और विप्लव के अग्रदूत थे।

2. 10 मई, 1857 की संध्या को सैनिकों ने मेरठ छावनी में खुली बगावत कर दी। कारतूसों का प्रयोग से इनकार कर दिया। फलतः 85 सैनिक को गिरफ्तार कर लिया गया साथी सैनिक एक होकर उन्हें छुड़ा लिया तथा दिल्ली की और कूच किया।

3.  “इस अवसर पर देष का अधिकांष प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ब्रिटिष शासन को चुनौती देने में समर्थ था, उतेजना आम थी और सारे देष में व्याप्त थी। कुछ भागों में विद्रोह ने एक खुले और स्पष्ट युद्ध का रूप लिया जिसमें लाखों और हजारों सैनिकों ने भाग लिया। कुछ भागों के विभिन्न स्थानों में सषस्त्र विद्रोह हुए कुछ में नागरिक विद्रोह हुए। पर भारत का कोई ऐसा भाग नहीं था जिसमें शासकों की नींद हराम न हुई हो और वहाँ विद्रोह का कोई भय न रहा हो।” 15 जून, 1857 तक क्रांति संपूर्ण भारत में फैल गयी।  http://shivagstudypoint.com

 

स्वरूप :-

इस विद्रोह के वास्तविक स्वरूप के विषय में पाष्चात्य एवं भारतीय इतिहासकारों में गहरा मतभेद है।

सर जॉन लारेंस – “यह सैनिक विद्रोह को छोड़कर और कुछ भी नहीं था और इसका तात्कालिक कारण कारतूस की घटना थी।”

जेम्स आउट्रम एवं टेलर –  “उसे हिन्दू मुस्लिम षड़यत्र का परिणाम मानते है।”

कुछ अंग्रेज  “इसे जनसाधारण द्वारा असंतोष अभिव्यक्ति का एक-एक उदारण मानते है।”

ईषाई मिषनरी – “ईष्वर द्वारा भेजी गई विपति मानते है।”

एल-ई-आर-रीज – “यह धर्मान्धों का ईसाईयों के विरूद्ध युद्ध था।”

T. R. होम्ज – “बर्बरता तथा सभ्यता के बीच युद्ध कहा है।”

                 इन मतों के विपरीत अन्य इतिहासकारों ने इसे क्रांति या राष्ट्रीय विद्रोह का स्वरूप देने का प्रयास किया।

बेंजामिन डिजरैली – “राष्ट्रीय विद्रोह कहा।”  http://shivagstudypoint.com

विनायक दामोदर सावरकर – “भारत की स्वतंत्रता का युद्ध कहा।”

S. N. सेन – “आंदोलन एक सैनिक विद्रोह की भांति आरंभ हुआ।”

           लेकिन सेना तक सीमित नहीं रहा। “सेना ने भी पूरी तरह विद्रोह में भाग नहीं लिया।”

डॉ रमेषचन्द्र मजुमदार – “यह सैनिक विद्रोह था, यद्यपि कुछ क्षेत्रों में जनसाधारण ने इसका समर्थन किया।”

एस. बी. चौधरी – “सामान्य जनता का विद्रोह बताया” लेकिन

ताराचंद – “यह विप्लव मध्ययुगीन विषिष्ट किंतु अषक्त वर्गों की अपनी खोई सत्ता को प्राप्त करने का अंतिम प्रयास था। ये वर्ग अंग्रेजी नियंत्रण से मुक्ति चाहते थे, क्योंकि अंग्रेजी प्रषासकीय नीतियों से उन विषिष्ट वर्गों के हितों को हानि पहुँचती थी।”

 

सैनिक विद्रोह के रूप में :-

          उपर्युक्त विवेचना से क्रांति के स्वरूप पर कुछ प्र्रकाष पड़ता है। हां शुरूआत बैरकपुर की छावनी से हुआ जहाँ मंगल पाँडे ने अंग्रेज अधिकारियों का मारा। मेरठ ने उसे आगे बढ़ाया। मेरठ से सैनिक दिल्ली पहुँचे और दिल्ली पर अधिकार कर मुगल बादषाह को अपना नेता बनाया। इस घटना के पष्चात् ही अन्य विद्रोही नेता इस संघर्ष में शामिल हुए। इस तरह यह स्पष्ट हो जाता है कि विद्रोह का आरंभ सैनिकों द्वारा ही हुआ। लेकिन यह भी सत्य है की सभी सैनिकों ने इस क्रांति में भाग नहीं लिया। सिखों ने तो उलटें विद्रोहियों को दबाने में मदद की। विद्रोहियों को सिर्फ अंग्रेजी सेना की सहायता से ही नहीं दबाया गया बल्कि उसमें भारतीय सेना का भी योगदान था। अतः यह पूर्णतः सैनिक विद्रोह नहीं था।

सामंती विद्रोह के रूप में :-

     इस क्रांति में सभी सामंतों, राजा महाराजाओं ने भाग नहीं लिया। इसमें सिर्फ वे ही सक्रिय रूप से भाग ले रहे थे जिनका राज्य छीन लिया गया था। पेंषन बंद कर दिया गया या अन्य तरह के आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंध लाद दिये गये थे। बहादुरषाह, जीनतमहल, नानाषाह, कुँवरसिंह, अवध के ताल्लुकेदार एवं जमींदार ऐसे ही असंतुष्ट व्यक्ति थे। इसके विपरीत भारतीय जमीदारों और नरेषों का एक बड़ा तबका (वर्ग) इस विप्लव से तटस्थ रहा। इतना ही नहीं ग्वालियर, इंदौर, जोधपुर, बीकानेर, हैदराबाद राजपूताना के अनेक राज्य भोपाल, पटियाला, नाभाजिंद, कष्मीर, नेपाल आदि शासकों ने विद्रोहियों को दबाने में अंग्रेजी सरकार की भरपूर मदद की। प्रो. विपिनचंद्र के अनुसार एक प्रतिषत से ज्यादा भारतीय प्रमुखों ने आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया। अतः इस विद्रोह को सामंती विद्रोह की सजा देना भी उचित नहीं है अतः एक अंग्रेज वायसराय ने कहा कि “यदि देषी शासकों ने हमें इस विप्लव को दबाने में सहयोग नहीं किया होता तो हम इस आंधी एक-एक लपटे में ही बह जाते।”  http://shivagstudypoint.com

हिंदू-मुस्लिम षड़यंत्रों के रूप  में :-

         1857 के विद्रोह को हिंदू – मुस्लिम संज्ञा देना भी उचित नहीं है। विद्रोह के नेता बहादूरषाह अनिच्छा एवं विवषतापूर्वक ही इसमें सम्मिलित हुए। उन्होंने विद्रोह की कोई योजना नहीं कर सके। इस क्रांति में हिंदू मुसलमान कंधा से कंधा मिलाकर लड़े। विद्रोह के नेता भी दोनों वर्गों से आते थे। दूसरी तरफ अंग्रेजों के हिमायती एवं विद्रोहियों को दबाने वालों में भी हिंदू-मुसलमान शामिल थे। अतः इसे हिंदू-मुस्लिम षड़यत्र था। मुस्लिम सत्ता की पुनर्स्थापना का प्रयासमात्र कहना अनुचित है। इस प्रकार इसे धर्मयुद्ध या सभ्यों और बर्बरों का युद्ध कहना वस्तुस्थिति से मुँह मोड़ना है।

कृषक विद्रोह के रूप में :-

        अनेक समकालीन अंग्रेज लेखकों ने 1857 के विद्रोह को एक कृषक विद्रोह मात्र माना है। उनके अनुसार भू-व्यवस्था तथा जमीदारों के अत्याचारों से पीड़ित किसानों ने विद्रोह में बड़ी संख्या में भाग लिया तथा विद्रोहियों की मदद की। यह बात ठीक है कि विद्रोह से नवोदित, पाष्चात्य षिक्षाप्राप्त मध्यमवर्ग अलग रहा, परंतु किसानों के अतिरिक्त समाज के अन्य वर्गों ने भी इसमें हिस्सा लिया। सबसे बड़ी बात यह है कि देषभर के किसानों को देखते हुए जितने किसानों ने भाग लिया उनकी संख्या बहुत कम थी। अतः 1857 के विद्रोह को मात्र कृषक विद्रोह के रूप में देखना सत्य नकारना है।

 

राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में :-

         अनेक विद्वानों ने इस आंदोलन को राष्ट्रीय विद्रोह स्वतंत्रता का युद्ध या सामान्य जनता का विद्रोह बताया है। उनके अनुसार विद्रोह का प्रधान उद्धेष्य अंग्रेजो को हटाकर पुनः सत्ता प्राप्त करना था। यह बात तो सिर्फ विक्षुब्ध शासकों एवं केवल जमीदारों के साथ लागू होती है। जनसाधारण ने तो अंग्रेजी व्यवस्था से होने वाले कष्टों के विरूद्ध विद्रोहियों का साथ दिया। अंग्रेजों के साथ-साथ बनियों एवं व्यापारियों को भी विद्रोहियों के आक्रोष का षिकार बनना पड़ा। जनता के सभी वर्गों ने विद्रोह में हिस्सा भी नहीं लिया।  http://shivagstudypoint.com

           आधुनिक षिक्षाप्राप्त वर्ग, मध्यम एवं उच्च वर्ग तथा संपतिषाली वर्ग इस आंदोलन से अलग रहा। कृषकों के बड़े समुदाय ने भी विद्रोह में साथ नहीं दिया। विद्रोह का प्रसार भी सीमित क्षेत्र में हुआ। उत्तर और मध्य भारत को छोड़कर देष के अन्य भागों में इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। अतः इसका स्वरूप  राष्ट्रीय एवं व्यापक भी नहीं था।

           इस विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि ऊपर जितने मतों की चर्चा की गई है। वे आंषिक रूप से ही आलोचना की कसौटी पर खरे उतरते है। कोई भी मत पूर्णतया सत्य नहीं है। अतः इस क्रांति का कोई एक निष्चित स्वरूप तय करना कठिन है। विभिन्न उद्धेष्यों से प्रेरित होकर अनेक वर्गों के व्यक्तियों ने इसमें हिस्सा लिया। तथापि इसका प्रारंभ एक सैनिक क्रांति के रूप में हुआ तथापि शीघ्र ही यह सीमित क्षेत्र में अंग्रेजों के विरूद्ध त्रस्त भारतीय जनता का विद्रोह एवं अंग्रेजी चंगुल से मुक्ति पाने का प्रथम व्यापक प्रयास बन गया।  http://shivagstudypoint.com

विद्रोह को दबाने वाले अंग्रेज अधिकारी :-

दिल्ली – निकलसन, सर हेनरी बर्नाडे, व्रिडो विलसन

बनारसइलाहबाद – नील

कानपुर – जॉन हैवलॉक, रेनर्ड, नील

लखनऊ – जॉनहैवलॉक,

मार्च, 1857 तक विद्रोह दबा दिया गया।

शेष जानकारी अगले भाग – 3 में ………… >>>> http://shivagstudypoint.com

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