वित विधेयक एवं धन विधेयक

वित विधेयक एवं धन विधेयक

वित विधेयक –

  • सामान्य रूप से ऐसा कोई विधेयक जो राजस्व या व्यय से संबंधित हो।
  • वित विधेयकों में किसी धन विधेयक के लिये उल्लिखित किसी मामले का उपबंध शामिल होने के अलावा अन्य राजस्व या व्यय संबंधी मामलों का भी उल्लेख किया जाता है।

 

– वित विधेयक –

श्रेणी क Art. 117(1)  

ऐसे विधेयक जिनमें धन विधेयक के लिए Art. 110 में उल्लिखित किसी भी मामलें के लिए उपबंध किए जाते है।

श्रेणी ख Art. 117(3)

ऐसे वितीय विधेयक जिनमें संचित निधि से व्यय संबंधी उपबंध किए गए हो।

  • वित विधेयक पेश किए जाने के पश्चात् 75 दिनों के भीतर संसद द्वारा इस पर विचार करके पास किया जाता है और उस पर राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हो जाना आवश्यक है।
  • वित विधेयक को पेश करने की अनुमति के लिए रखे गए प्रस्ताव का विरोध नहीं किया जा सकता और उसे तुरंत मतदान के लिए रखा जाता है।
  • सभी धन विधेयक, वित विधेयकों की श्रेणी में आते है किन्तु सभी वित विधेयक, धन विधेयक नहीं होते है।

श्रेणी 1st

  • दो रूपों में धन विधेयक के समान है
  1. दोनों लोकसभा में पेश किए जाते है।
  2. दोनों राष्ट्रपति की सहमति के बाद पेश किए जाते है।
  • इसे राज्यसभा द्वारा स्वीकार या अस्वीकार किया जा सकता है।
  • वित विधेयक में संयुक्त बैठक बुला सकता है राष्ट्रपति।

श्रेणी 2nd

  • इसमें वह कोई मामला नहीं होता है जिसका उल्लेख Art. 110 में होता है।
  • इसे साधारण विधेयक की तरह प्रयोग किया जाता है।
  • इस विधेयक की एकमात्र प्रमुख विशेषता यह है कि संसद के किसी भी सदन द्वारा इसे तब तक पारित नहीं किया जा सकता जब तक राष्ट्रपति सदन को ऐसा करने की अनुशंसा न दे दे।
  • इसे संसद के किसी भी सदन में पुन: स्थापित किया जा सकता है।
  • इसे प्रस्तुत करने के लिये राष्ट्रपति की सहमति की आवश्यकता नहीं होती है।
  • संयुक्त बैठक बुला सकता है।
  • दोनों सदन स्वीकार या अस्वीकार कर सकते है।

धन विधेयक –

  • संविधान के अनु. 110 के अनुसार धन विधेयक ऐसा  वित विधेयक होता है जो इनमें से कोई एक या एकाधिक विषय अंतर्निहित किए हो।

A.  किसी कर को लगाना, हटाना या उसमें परिवर्तन करना।

B.  सरकार द्वारा धन का विनियमन या ऋण लेना।

C.  भारत की संचित निधि या आकस्मिक निधि में धन जमा करना या निकालना।

D.  भारत की संचित निधि से धन का विनियोग अर्थात् किसी नए व्यय को भारत की संचित निधि पर प्रभारित व्यय घोषित करना।

E.  अनु. 110 के उपखंड क से च तक वर्णित किसी भी विषय का अनुषांगिक विषय का शामिल होना।

कोई विधेयक उपरोक्त विषयों से संबंधित होते हुए भी धन विधेयक होना तब तक सुनिश्चित नहीं होता जब तक कि उसे लोकसभा स्पीकर द्वारा धन विधेयक न घोषित किया जाए। अर्थात् किसी विधेयक के धन विधेयक होने या न होने का अंतिम निर्णय लोकसभा अध्यक्ष का है।

  • स्पीकर के निर्णय को किसी न्यायालय, संसद या राष्ट्रपति द्वारा चुनौती नहीं दी जा सकती है।
  • धन विधेयक केवल लोकसभा में केवल राष्ट्रपति की सिफारिश से ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
  • इस प्रकार के प्रत्येक विधेयक को सरकारी विधेयक माना जाता क्योंकि इसे केवल मंत्री ही प्रस्तुत कर सकता है।
  • राज्यसभा धन विधेयक को अस्वीकृत या संशोधित नहीं कर सकती है। यह केवल सिफारिश कर सकती है।
  • राज्यसभा को 14 दिन के भीतर इस पर स्वीकृति देनी होती है अन्यथा वह राज्यसभा द्वारा पारित समझा जाता है।
  • यदि LS सिफारिश मान लेती है तो फिर इस संशोधित विधेयक को दोनों सदनों द्वारा संयुक्त रूप से पारित समझा जाता है।

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